बढ़ते जलवायु दबाव और मजबूत अल नीनो प्रभाव के कारण दुनिया के महासागरों का औसत तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। महासागरों द्वारा अत्यधिक गर्मी सोखे जाने के कारण समुद्री हीटवेव, प्रवाल ब्लीचिंग, ‘डेड जोन’ का विस्तार और अधिक शक्तिशाली चक्रवातों का खतरा बढ़ गया है, जो जैव विविधता और तटीय समुदायों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। दुनिया के महासागरों का औसत तापमान अब तक दर्ज किए गए सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। हालिया वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, बढ़ते जलवायु दबाव और मजबूत होते अल नीनो प्रभाव ने समुद्री तापमान में इस असाधारण वृद्धि को और तेज किया है।
उपग्रहों, समुद्री बुआ नेटवर्क और शोध पोतों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक समुद्री सतह का तापमान पिछले सभी रिकॉर्ड को पार कर चुका है। इसका असर प्रशांत, अटलांटिक, हिंद और दक्षिणी महासागर सहित दुनिया के प्रमुख समुद्री क्षेत्रों में देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्रों का गर्म होना केवल सतह तक सीमित नहीं है।
महासागरों की गहरी परतों में भी उल्लेखनीय तापमान वृद्धि दर्ज की गई है। इसका मतलब है कि महासागर वायुमंडल से निकलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा की बड़ी मात्रा को अवशोषित कर उसे अपने भीतर जमा कर रहे हैं। महासागरों के दीर्घकालिक गर्म होने का सबसे बड़ा कारण वातावरण में लगातार बढ़ रही ग्रीनहाउस गैसें हैं।
ये गैसें गर्मी को रोककर रखती हैं और पृथ्वी की सतह के 70 प्रतिशत से अधिक हिस्से में फैले महासागर इस अतिरिक्त ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं। इस दीर्घकालिक गर्मी के ऊपर मौजूदा अल नीनो का प्रभाव भी जुड़ गया है।
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इस बार अल नीनो अपेक्षाकृत मजबूत रहा है, जिसने वैश्विक समुद्री तापमान को और ऊपर पहुंचाने में योगदान दिया है।
महासागरों के रिकॉर्ड तापमान का असर समुद्री और स्थलीय दोनों पारिस्थितिक तंत्रों पर दिखाई दे रहा है। समुद्री हीटवेव अधिक लगातार, लंबी और गंभीर होती जा रही हैं। इनके कारण प्रवाल भित्तियों में ब्लीचिंग, मछलियों के प्रवास में बदलाव और समुद्री संसाधनों पर निर्भर तटीय समुदायों की आजीविका पर खतरा बढ़ रहा है।
गर्म पानी के फैलने से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि भी तेज हो सकती है। वहीं, अधिक गर्म समुद्री जल में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से ऐसे क्षेत्र बढ़ रहे हैं, जिन्हें समुद्री जीवन के लिए ‘डेड जोन’ कहा जाता है। इन परिस्थितियों में मछलियों और अन्य समुद्री जीवों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
समुद्रों में जमा अतिरिक्त गर्मी का असर जमीन पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे उष्णकटिबंधीय चक्रवात अधिक शक्तिशाली हो सकते हैं, मानसून के पैटर्न में बदलाव आ सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश तथा सूखे की घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र के तापमान में वृद्धि पिछले दशकों की तुलना में तेज हुई है। खासकर 1990 के दशक के बाद महासागरीय गर्मी बढ़ने की दर में उल्लेखनीय तेजी देखी गई है। मानवजनित जलवायु परिवर्तन और मजबूत अल नीनो के संयुक्त प्रभाव ने वैश्विक जलवायु प्रणाली को असामान्य स्थिति में पहुंचा दिया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अल नीनो के कमजोर पड़ने के बाद भी समुद्र का तापमान कई महीनों तक ऊंचा बना रह सकता है।
इसका कारण समुद्री जल की अत्यधिक तापीय जड़ता है, जिसके चलते महासागर बड़ी मात्रा में अवशोषित गर्मी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और दुनिया भर के तटीय समुदायों के लिए गंभीर जोखिम का संकेत है।
उनका कहना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने के साथ-साथ समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के संरक्षण और पुनर्स्थापना के प्रयासों को भी तेज करना होगा। महासागरों का यह नया तापमान रिकॉर्ड इस बात का एक स्पष्ट संकेत है कि बढ़ते जलवायु दबावों के प्रति पृथ्वी की जलवायु प्रणाली कितनी तेजी से प्रतिक्रिया कर रही है।
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