निर्माण उद्योग में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ऐसी नई कंक्रीट तकनीकें विकसित की गई हैं जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को सोखती हैं और समय के साथ अधिक मजबूत होती हैं। यह तकनीक अब प्रयोगशालाओं से निकलकर व्यावसायिक पायलट परियोजनाओं तक पहुँच चुकी है, क्योंकि पारंपरिक सीमेंट निर्माण दुनिया के कुल CO₂ उत्सर्जन का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : निर्माण उद्योग में कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में ऐसी नई कंक्रीट तकनीकें तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) सोखने के साथ समय के साथ अधिक मजबूत भी होती हैं।
प्रयोगशालाओं से निकलकर यह तकनीक अब व्यावसायिक पायलट परियोजनाओं तक पहुंच गई है। परंपरागत कंक्रीट उत्पादन से दुनिया के कुल CO₂ उत्सर्जन का करीब 8 प्रतिशत जुड़ा है, जिसका बड़ा कारण सीमेंट निर्माण है।
नई तकनीक में कंक्रीट के मिश्रण या curing के दौरान CO₂ को कैल्शियम यौगिकों के साथ प्रतिक्रिया कराई जाती है। इससे स्थिर कैल्शियम कार्बोनेट (कैल्साइट) बनता है, जो कार्बन को कंक्रीट के भीतर स्थायी रूप से बांध देता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रक्रिया से कंक्रीट की सूक्ष्म संरचना अधिक घनी हो सकती है, जिससे उसकी संपीड़न और तन्य क्षमता बढ़ती है। CO₂ मिश्रण तकनीक में CarbonCure जैसी कंपनियां ताजा कंक्रीट में कैप्चर की गई CO₂ डालती हैं। कुछ मिश्रणों में इससे शुरुआती मजबूती करीब 10–15 प्रतिशत बढ़ी है और बिना प्रदर्शन घटाए सीमेंट की मात्रा 5 प्रतिशत या उससे अधिक कम की जा सकती है।
दूसरी तकनीक में प्रीकास्ट कंक्रीट उत्पादों को CO₂ से भरपूर वातावरण में curing कराया जाता है। फुटपाथ स्लैब और ईंटों जैसे उत्पादों के पायलट परीक्षणों में बेहतर यांत्रिक गुणों और CO₂ अवशोषण दोनों के संकेत मिले हैं। डायटोमेशियस अर्थ, बायोचार और विशेष बाइंडर जैसी सामग्रियों वाले उन्नत मिश्रणों ने प्रयोगशाला परीक्षणों में पारंपरिक कंक्रीट की तुलना में 142 प्रतिशत तक अधिक CO₂ अवशोषण दिखाया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार बनने वाले कैल्साइट क्रिस्टल कंक्रीट के छिद्रों को भरकर बाइंडर नेटवर्क को अधिक घना बनाते हैं। कुछ प्रणालियों में सामान्य वातावरण में भी carbonation जारी रहने से कंक्रीट समय के साथ मजबूत हो सकता है। हालांकि CO₂ की पर्याप्त आपूर्ति, अलग-अलग जलवायु के लिए मिश्रण का अनुकूलन और लागत को प्रतिस्पर्धी बनाना अभी चुनौती है।
इसके बावजूद उत्सर्जन में कमी और मजबूती बढ़ाने की दोहरी क्षमता के कारण यह तकनीक निर्माण क्षेत्र को कम-कार्बन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है।
Also Read: 6.5 करोड़ वर्ष पहले यूरोप में विकसित हुए थे चमगादड़, जीनोमिक अध्ययन में बड़ा खुलासा

