देश के आधे से ज़्यादा डेटा सेंटर पहले से ही पानी की कमी झेल रहे इलाकों में — फिर भी और बनाने की होड़ जारी
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। नई दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद के घनी आबादी वाले इलाके खोड़ा में रहने वाले लोग बरसों से साफ पानी के लिए जूझ रहे हैं। यहां के निवासी भूजल पर निर्भर हैं और कई जगहों पर पानी निकालने के लिए 1,000-1,200 फीट तक जमीन खोदनी पड़ती है। पिछले 10 साल से स्थानीय लोग पानी की समस्या के समाधान की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हालात में खास बदलाव नहीं आया है। अब इसी इलाके में कई डेटा सेंटर खड़े हो चुके हैं।
दुनियाभर की कंपनियां एआई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए होड़ में हैं और भारत भी खुद को इस दौड़ में एक बड़े हब के तौर पर स्थापित करने में जुटा है। लेकिन डेटा सेंटरों के सर्वर ठंडे रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। ऐसे में खोड़ा जैसे पहले से पानी की कमी झेल रहे इलाकों पर नए डेटा सेंटरों का दबाव चिंता बढ़ा रहा है। 35 साल से खोड़ा में रह रहे बढ़ई नईमुद्दीन सैफी के पास आज भी अपना पानी कनेक्शन नहीं है।
यहां के ज्यादातर लोगों की तरह वे साझा बोरवेल कनेक्शन पर निर्भर हैं, जिसके लिए हर महीने 1,000-1,200 रुपये चुकाने पड़ते हैं। उनके लिए यह खर्च अकेले उठाना संभव नहीं है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, एक बोरवेल लगवाने में करीब 5 लाख रुपये खर्च होते हैं, जिसे कई परिवार वहन नहीं कर सकते। इसके बावजूद बोरवेल कोई स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि भूजल स्तर कब तक साथ देगा, इसका कोई भरोसा नहीं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई परिवार इलाका छोड़कर जा चुके हैं।
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के आधे से ज्यादा डेटा सेंटर ऐसे इलाकों में स्थित हैं जहां पहले से पानी की कमी है। ग़ाज़ियाबाद भी इन्हीं क्षेत्रों में शामिल है, जहां भूजल का बड़े पैमाने पर दोहन जारी है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के मुताबिक, यहां हर साल निकाले जा सकने वाले भूजल की मात्रा करीब 2,714 हेक्टेयर मीटर तय है, लेकिन 2024-25 में इससे करीब 272 फीसदी ज्यादा पानी निकाला गया।
ग़ाज़ियाबाद-नोएडा क्षेत्र में तेज शहरीकरण ने पानी की उपलब्धता का पुराना समीकरण बदल दिया है। कभी नहर, नदी और भूजल की मौजूदगी के कारण इस इलाके को अपेक्षाकृत बेहतर जल उपलब्धता वाला क्षेत्र माना जाता था, लेकिन बढ़ती आबादी और निर्माण गतिविधियों ने मांग तेजी से बढ़ा दी। अब डेटा सेंटरों की भारी कूलिंग जरूरतें इस दबाव को और बढ़ा रही हैं। कूलिंग सिस्टम से निकलने वाली गर्मी आसपास के माइक्रोक्लाइमेट को प्रभावित कर सकती है, जिससे आसपास की इमारतों में एयर कंडीशनिंग की मांग भी बढ़ने की आशंका है।
हालांकि बड़े डेटा सेंटरों के स्थानीय प्रभाव का पूरी तरह आकलन करने के लिए अभी पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। 2025 में अधिकारियों ने गंगा का पानी सीधे खोड़ा तक पहुंचाने वाली लंबे समय से प्रस्तावित परियोजना को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया। इसका विकल्प तलाशने की बात कही गई है, लेकिन स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्हें अब तक इस संबंध में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली है। इसी बीच, खोड़ा से कुछ ही मिनट की दूरी पर अडानीकनेक्स का नया डेटा सेंटर खड़ा है।
यह भारत के अडानी समूह और अमेरिका की EdgeConneX के बीच 50:50 साझेदारी वाला उपक्रम है। सेंटर की पानी खपत को लेकर सवाल पूछे गए, लेकिन प्रकाशन तक कोई जवाब नहीं मिला। अडानीकनेक्स नोएडा में मौजूद 20 से ज्यादा डेटा सेंटरों में से एक है। उत्तर प्रदेश की 2026 डेटा सेंटर नीति के मसौदे में राज्य सरकार ने डेटा सेंटरों को 24 घंटे निर्बाध पानी की आपूर्ति का वादा किया है।
नोएडा में पानी का संकट खास तौर पर इसलिए गंभीर है क्योंकि शहरी मांग तेजी से बढ़ रही है और भूजल अब भी पानी का एक बड़ा स्रोत बना हुआ है। वहीं, नेशनल कैपिटल रीजन में डेटा सेंटर फिलहाल कुल कितना पानी खर्च कर रहे हैं, इसका कोई आधिकारिक अनुमान उपलब्ध नहीं है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुताबिक, भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता इस दशक की शुरुआत से करीब चार गुना बढ़ चुकी है। 2020 में यह क्षमता लगभग 375 मेगावाट थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 1,500 मेगावाट हो गई। Data Center Map के मुताबिक, देशभर में अब 305 डेटा सेंटर मौजूद हैं।
इनके लिए 2025 में करीब 15 करोड़ टन पानी की खपत का अनुमान है और कुछ अनुमानों के अनुसार यह आंकड़ा 2030 तक दोगुना हो सकता है। पानी की खपत के आंकड़ों के साथ-साथ निगरानी और नियमन का सवाल भी महत्वपूर्ण है। भारत में डेटा सेंटरों के पानी इस्तेमाल को लेकर व्यवस्था कई स्तरों पर बंटी हुई है। भूजल निकालने के लिए कंपनियों को नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना जरूरी है, जिसमें पानी निकालने की सीमा तय होती है।
लेकिन कंपनियों के लिए अपनी वास्तविक मासिक या सालाना पानी खपत के आंकड़े सार्वजनिक करना अनिवार्य नहीं है। यूरोपीय देशों की तुलना में यह पारदर्शिता का बड़ा अंतर है। यूरोपीय संघ में डेटा सेंटरों के लिए पानी की खपत समेत स्थिरता से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों का खुलासा करना अनिवार्य है। कम से कम 500 किलोवाट क्षमता वाले डेटा सेंटरों को अपने संबंधित आंकड़े यूरोपीय डेटाबेस में दर्ज कराने होते हैं। भारत में भी अनिवार्य पारदर्शिता को पहला कदम बनाने की जरूरत बताई जा रही है। हर साल डेटा सेंटरों के ऊर्जा, पानी और कार्बन इस्तेमाल के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।
साथ ही यह जानकारी भी सामने आए कि पानी कहां से प्राप्त किया जा रहा है और उसमें से कितना हिस्सा रीसाइकल किया जा रहा है। चरणबद्ध तरीके से पानी और बिजली दक्षता के मानक तय करने की जरूरत है, ताकि किसी डेटा सेंटर को मंजूरी देने से पहले सिर्फ जमीन और बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि उस क्षेत्र में उपलब्ध जल संसाधनों का भी आकलन किया जा सके।
सबसे बड़ी चुनौती किसी एक डेटा सेंटर से पैदा होने वाला दबाव नहीं, बल्कि एक ही एक्वीफर पर निर्भर कई-कई सुविधाओं का सामूहिक असर है। नेशनल कैपिटल रीजन जैसे इलाकों में जब कई डेटा सेंटर एक साथ पानी की मांग बढ़ाते हैं, तो इसका प्रभाव स्थानीय जल संसाधनों और उन पर निर्भर आबादी पर कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।
आखिरकार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भारत को कितने नए डेटा सेंटर चाहिए, बल्कि यह भी है कि उन्हें कहां बनाया जाए और उनके लिए पानी कहां से आए। पानी की कमी वाले इलाकों में जब एक तरफ लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करना चुनौती बनी हुई हों और दूसरी तरफ उद्योगों की पानी की मांग बढ़ रही हो, तब संसाधनों के बंटवारे का सवाल सामाजिक और वितरणात्मक न्याय से भी जुड़ जाता है।
ऐसे में विकास और डिजिटल विस्तार की दौड़ के बीच यह तय करना जरूरी होगा कि पीने के पानी की प्राथमिकता कैसे सुरक्षित रहे और डेटा सेंटरों की बढ़ती जरूरतों का बोझ पहले से संकटग्रस्त जल संसाधनों पर न पड़े।
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