भारत का खाद्य विनिर्माण और पैकेजिंग उद्योग पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर तकनीक, टिकाऊपन और रिसाइक्लिंग पर केंद्रित होता जा रहा है। सरकार के नए नियमों और बढ़ते बाजार के बीच, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग वर्ष 2030 तक करीब 600 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि भारतीय पैकेजिंग उद्योग 100 अरब डॉलर के स्तर की ओर तेजी से अग्रसर है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत का खाद्य विनिर्माण और पैकेजिंग उद्योग तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक पैकेजिंग व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए उद्योग अब तकनीक, टिकाऊपन, रिसाइक्लिंग और उपभोक्ता विश्वास पर केंद्रित आधुनिक इकोसिस्टम का रूप ले रहा है। सरकार की ओर से टिकाऊ पैकेजिंग और रिसाइकिल्ड सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले नियमों के बीच भारत का खाद्य प्रसंस्करण उद्योग वर्ष 2030 तक करीब 600 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, पैकेजिंग क्षेत्र में अब केवल उत्पाद को सुरक्षित रखने तक सीमित सोच नहीं रह गई है। पैकेजिंग के इस्तेमाल के बाद उसका क्या होता है, इसे भी उद्योग की जिम्मेदारी और कारोबारी रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। इसी बदलाव के चलते कंपनियां सर्कुलर इकोनॉमी, रिसाइक्लिंग और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री को अपने उत्पादन मॉडल में शामिल कर रही हैं।
Fi India और ProPak India 2026 में विशेषज्ञों ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि खाद्य पदार्थों के सीधे संपर्क में इस्तेमाल होने वाले रीसाइकिल्ड PET यानी पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट की मौजूदा क्षमता करीब 7.5 लाख टन प्रतिवर्ष है। अगले दो वर्षों में इसके बढ़कर करीब 11 लाख टन प्रतिवर्ष होने की उम्मीद है। रीसाइकिल्ड सामग्री के अनिवार्य इस्तेमाल से इस क्षेत्र में बदलाव और तेज होने की संभावना है। नियमों के तहत रीसाइकिल्ड कंटेंट की हिस्सेदारी 2025 में 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत की जा रही है। आगे चलकर यह हिस्सेदारी 50 से 60 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इससे पैकेजिंग निर्माताओं के सामने पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने के साथ-साथ नई तकनीकों और उत्पादन प्रक्रियाओं को अपनाने की जरूरत बढ़ेगी।
वहीं, PET की खपत वर्तमान में सालाना करीब 10-12 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। आने वाले समय में इसके बढ़कर 14-16 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर तक पहुंचने का अनुमान है। खाद्य और पेय पदार्थों की बढ़ती मांग, संगठित खुदरा बाजार का विस्तार और सुविधाजनक पैकेज्ड उत्पादों की लोकप्रियता इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। भारतीय पैकेजिंग उद्योग में तकनीकी नवाचार भी तेजी से बढ़ रहा है। देश में स्वचालित सॉर्टिंग मशीनें विकसित की जा रही हैं, जिनकी लागत आयातित विकल्पों की तुलना में काफी कम बताई जा रही है।
ऐसी तकनीक रिसाइक्लिंग प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाने के साथ पैकेजिंग कचरे की छंटाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में SIES School of Packaging के मुख्य रणनीतिकार राजेश कुमार गेहरा उन्होंने कहा कि, रीसाइकिल्ड सामग्री के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को केवल अतिरिक्त बोझ के रूप में देखने के बजाय उद्योग को इन्हें नए डिजाइन और नवाचार के अवसर के रूप में देखना चाहिए।
उनके मुताबिक, जो कंपनियां अपनी लागत संरचना में टिकाऊपन को शामिल करेंगी, उनके भविष्य में आगे बढ़ने की संभावना अधिक होगी। रीसाइकिल्ड कंटेंट से जुड़े कड़े मानक, सर्कुलर डिजाइन और स्वदेशी AI आधारित ऑटोमेशन भारत के पैकेजिंग उद्योग को नई दिशा दे रहे हैं। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में World Packaging Organisation के ग्लोबल एंबेसडर चक्रवर्ती एवीपीएस के अनुसार, वैश्विक पैकेजिंग उद्योग पहले ही 1.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का आकार हासिल कर चुका है और भारत तेजी से 100 अरब डॉलर के स्तर की ओर बढ़ रहा है।
पैकेजिंग अब केवल उत्पाद को ढकने या सुरक्षित रखने का माध्यम नहीं रह गई है। यह उत्पाद की शेल्फ लाइफ, खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता और उपभोक्ता विश्वास को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण तकनीकी कड़ी बन चुकी है। ऐसे में पैकेजिंग क्षेत्र में होने वाला निवेश खाद्य प्रसंस्करण उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी मजबूत कर सकता है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में Informa Markets India के प्रबंध निदेशक योगेश मुद्रास ने कहा कि भारत का खाद्य विनिर्माण क्षेत्र अब विकास के एक उन्नत चरण में प्रवेश कर रहा है।
इस दौर में अवसर केवल बढ़ती खपत से नहीं, बल्कि नवाचार, वैल्यू एडिशन और बड़े पैमाने पर उत्पादन क्षमता के विस्तार से भी पैदा होंगे। इस वर्ष आयोजित Fi India और ProPak India ने खाद्य विनिर्माण से लेकर पैकेजिंग तक पूरी वैल्यू चेन को एक मंच पर लाया। आयोजनों में 500 से अधिक प्रदर्शकों और 1,500 ब्रांडों ने हिस्सा लिया। इनमें 50 से अधिक देशों के 15,000 से ज्यादा उद्योग पेशेवरों ने भागीदारी की। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में टिकाऊ पैकेजिंग, रिसाइक्लिंग क्षमता, AI आधारित स्वचालन और स्वदेशी तकनीक भारत के पैकेजिंग उद्योग की प्रतिस्पर्धा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
यदि उद्योग नियामकीय जरूरतों के साथ नवाचार और लागत दक्षता का संतुलन कायम करता है, तो भारत का पैकेजिंग क्षेत्र न केवल घरेलू खाद्य उद्योग की बढ़ती जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा सकता है।
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