विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ के अनुसार, वर्ष 2025 में दुनिया की नदियों ने तीन दशकों से अधिक समय में सबसे शुष्क वर्षों में से एक का सामना किया।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: दुनिया की नदियों ने वर्ष 2025 में तीन दशकों से अधिक समय में सबसे शुष्क वर्षों में से एक का सामना किया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर नदियों में सामान्य से कम जल प्रवाह ने मीठे पानी की उपलब्धता और दीर्घकालिक जल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
WMO की ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के करीब 36 प्रतिशत नदी बेसिन क्षेत्र में जल प्रवाह सामान्य से कम रहा। लगभग 36 प्रतिशत बेसिन में प्रवाह सामान्य दर्ज किया गया, जबकि 21 प्रतिशत में सामान्य से अधिक जल प्रवाह रहा। वर्ष 1991 से शुरू हुए 35 वर्ष के रिकॉर्ड में 2025 वैश्विक नदी प्रवाह के लिहाज से सबसे सूखे वर्षों में शामिल रहा।
रिपोर्ट के अनुसार लगातार सातवें वर्ष सामान्य जल प्रवाह वाले नदी बेसिनों का हिस्सा 1991-2020 के दीर्घकालिक औसत 46 प्रतिशत से काफी नीचे रहा। इस अवधि में सामान्य प्रवाह वाले बेसिनों का हिस्सा केवल 34 से 38 प्रतिशत के बीच रहा। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक जल चक्र अधिक अनियमित और अप्रत्याशित हो रहा है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों में सूखे और अत्यधिक जल उपलब्धता की स्थिति एक साथ देखने को मिल रही है।
WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा कि वैश्विक स्थलीय जल भंडारण में लगातार गिरावट चिंता का विषय है। भूजल, झीलों, नदियों, मिट्टी की नमी, वनस्पति, बर्फ और हिमनदों में मौजूद कुल मीठे पानी के भंडार में 2014-16 के आसपास से लगातार गिरावट देखी गई है। उनके अनुसार यह केवल एक खराब वर्ष का प्रभाव नहीं, बल्कि करीब एक दशक से जारी संकेत है। पिछले पांच वर्षों में अमेजन और ला प्लाटा बेसिन, उत्तरी अमेरिका, मध्य और पूर्वी अफ्रीका, मध्य एशिया तथा मध्य पूर्व के बड़े हिस्सों में लगातार सामान्य से कम नदी प्रवाह दर्ज किया गया।
2025 में उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों, पूर्वी यूरोप, मध्य पूर्व और मध्य एशिया में विशेष रूप से शुष्क परिस्थितियां रहीं। अफ्रीका में स्थिति क्षेत्रवार अलग रही। पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों के कुछ नदी बेसिनों में सामान्य से अधिक प्रवाह दर्ज किया गया, जबकि नील, कांगो और जाम्बेजी बेसिन में प्रवाह काफी कम रहा। इसके विपरीत दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया तथा उत्तरी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक से लेकर बहुत अधिक जल प्रवाह दर्ज किया गया।
रिपोर्ट में लगातार चौथे वर्ष दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में हिमनदों के द्रव्यमान में व्यापक कमी को भी रेखांकित किया गया है। इससे उन समुदायों के दीर्घकालिक जल स्रोतों पर असर पड़ सकता है जो हिमनदों पर निर्भर हैं। पिछले पांच वर्षों में एशिया और अफ्रीका में जल संबंधी अत्यधिक घटनाओं का कम से कम आधा हिस्सा दर्ज हुआ और इनसे जुड़ी 80 प्रतिशत से अधिक मौतें भी इन्हीं क्षेत्रों में हुईं।
विशेषज्ञों के अनुसार जल प्रवाह में बढ़ती अनिश्चितता का असर कृषि, पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत, पारिस्थितिकी तंत्र और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। WMO ने बेहतर जल निगरानी, आंकड़ों के आदान-प्रदान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और अनुकूल जल प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जल संबंधी आंकड़ों की उपलब्धता में सुधार हुआ है और अब कई देश नियमित रूप से अपने आंकड़े साझा कर रहे हैं।
हालांकि, सबसे अधिक प्रभावित कुछ क्षेत्रों में अभी भी आंकड़ों की कमी बनी हुई है। बदलती जल परिस्थितियां देशों के लिए अधिक अस्थिरता और संभावित जल संकट को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक योजना बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
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