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Environment Pulse > News > कैमूर की पहाड़ियां: जहां हर चट्टान, हर झरना और हर दरार में छिपी है जिंदगी की एक नई कहानी
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कैमूर की पहाड़ियां: जहां हर चट्टान, हर झरना और हर दरार में छिपी है जिंदगी की एक नई कहानी

Environment Pulse
Last updated: August 14, 2026 5:13 pm
Environment Pulse
Published: August 14, 2026
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बिहार के कैमूर पठार (भभुआ क्षेत्र) में दिसंबर 2025 से शुरू होकर 6 महीने तक चले एक विशेष वैज्ञानिक अध्ययन में वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की भारी विविधता दर्ज की गई है। 

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। कैमूर की पहाड़ियां अपनी प्राकृतिक समृद्धि के लिए हमेशा से जानी जाती रही हैं, लेकिन हाल ही में हुए एक विस्तृत अध्ययन ने इस समृद्धि को आंकड़ों में भी दर्ज कर दिया है।

इस क्षेत्र में किए गए सर्वे में वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की इतनी बड़ी संख्या और विविधता सामने आई है कि यह एक बार फिर साबित करता है कि कैमूर सिर्फ साधारण जंगल-पहाड़ नहीं, बल्कि जैव विविधता का एक भरा-पूरा संसार है।

दिसंबर 2025 से शुरू होकर करीब छह महीने तक चला यह अध्ययन भभुआ क्षेत्र में किया गया, जिसमें एक टीम ने पहाड़ी इलाकों के साथ-साथ चट्टानों, गुफाओं, बिलों और दरारों तक जाकर बारीकी से सर्वेक्षण किया।

मकसद था इस पूरे क्षेत्र में मौजूद प्रजातियों की पहचान करना और आगे उनके संरक्षण के लिए जरूरी जानकारी इकट्ठा करना। इस काम में पर्वत के वैज्ञानिक अधिकारी भावेश कुमार के साथ विजयंत जिशिन, डॉ. के किशोर कुमार, हर्षिता प्रकाश, साक्षी और तथागत अवतार शामिल रहे।

इतने महीनों की मेहनत के बाद जो नतीजे सामने आए, उन्होंने इलाके की तस्वीर ही बदल दी।

अध्ययन के दौरान वनस्पतियों की कुल 64 परिवारों में फैली 238 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें फूल वाले पौधों के अलावा फर्न, ब्रायोफाइट्स और स्टोनवर्ट्स जैसी वनस्पतियां भी शामिल हैं।

यह आंकड़ा खुद बताता है कि कैमूर की पहाड़ियां सामान्य पेड़-पौधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां वनस्पतियों की एक बेहद विस्तृत और विविध दुनिया मौजूद है।

और यह सिर्फ शुरुआत थी—जीव-जंतुओं के मामले में नतीजे कम दिलचस्प नहीं रहे। सौ से ज्यादा परिवारों में बंटी कुल 244 प्रजातियां अलग-अलग वर्गों में दर्ज की गईं। इनमें मछलियों की तीन प्रजातियां, उभयचरों की पांच और मकड़ियों की 18 प्रजातियां शामिल हैं।

पक्षियों की बात करें तो 17 परिवारों की कुल 99 प्रजातियां मिलीं, जिनमें से कई पहाड़ी और वन क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खासतौर पर अहम मानी जाती हैं। कीड़े-मकोड़ों की भी 98 प्रजातियां पहचानी गईं, जो इलाके की समृद्ध जैव विविधता को और पुख्ता करती हैं।

इसके अलावा घोंघे और अन्य छोटे जीवों की मौजूदगी ने भी इस सूची को और लंबा कर दिया। सर्वे में केकड़ों की दो प्रजातियां, सरीसृपों की आठ प्रजातियां और स्तनधारियों की छह प्रजातियां भी मिलीं, साथ ही भृंग यानी बीटल्स, तितलियों और कुछ अन्य जीवों की प्रजातियां भी दर्ज की गईं। इतनी विविधता अपने आप नहीं मिल गई—इसके लिए टीम ने कैमूर पठार के कई महत्वपूर्ण हिस्सों की खाक छानी, जिनमें करकटगढ़, तेल्हाड़ कुंड, करमचट क्षेत्र, किजियारी पहाड़ियां, तुतला भवानी, रोहतासगढ़, धनकवरा और ताराचंडी के आसपास के इलाके शामिल हैं।

करकटगढ़ में कर्मनाशा नदी और वहां के झरनों का अध्ययन किया गया, तेल्हाड़ कुंड और करमचट क्षेत्र के जलाशयों तथा किजियारी की पहाड़ियों को भी परखा गया, तुतला भवानी के झरनों और रोहतासगढ़ के किला क्षेत्र में भी सर्वे हुआ, जबकि धनकवरा के खनन क्षेत्र, वहां के घास के मैदानों और ताराचंडी के आसपास के इलाकों को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया।

पर कैमूर की पहाड़ियों की अहमियत सिर्फ प्राकृतिक संपदा तक सीमित नहीं है। इसी अध्ययन के दौरान टीम ने क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता को भी परखा और यहां मौजूद पुरानी कलाकृतियों, वस्तुओं और शैलचित्र स्थलों की जानकारी जुटाई। साथ ही गुफाओं, बिलों, दरारों और अन्य प्राकृतिक संरचनाओं का भी बारीकी से अध्ययन किया गया। इस दौरान यह भी सामने आया कि पिछले कुछ वर्षों में कैमूर की पहाड़ियों के कई हिस्सों में पर्यटन तेजी से बढ़ा है, जिससे इस इलाके की अहमियत और भी बढ़ जाती है।

करकटगढ़ जैसे इलाकों में कीड़े-मकोड़े, पक्षी, जलीय जीव, घास की किस्में और तितलियां—सभी मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जो अपने आप में देखने लायक है। कुल मिलाकर कैमूर का यह पहाड़ी क्षेत्र प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर की दृष्टि से भी उतना ही अहम है। इस अध्ययन में जुटाए गए आंकड़े आने वाले समय में इस इलाके के संरक्षण की योजना बनाने के लिए एक ठोस आधार का काम कर सकते हैं—यह बात डीएफओ संजीव रंजन ने भी रेखांकित की है।

Also Read: भारत में स्कूली पर्यावरण शिक्षा को कैसे बदला जा सकता है?

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