सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच भारत के बिजली क्षेत्र का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन स्थिर रहा है। 50 वर्षों में यह पहली बार है कि बिजली की मांग 7% बढ़ने के बावजूद कोयला आधारित बिजली उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई, क्योंकि इस मांग को पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा (सौर, पवन, जलविद्युत और परमाणु) ने पूरा किया। इस दौरान 77 GW सौर और 11 GW पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई।हालांकि, इस्पात और सीमेंट उद्योगों में तेज वृद्धि के कारण देश का कुल कार्बन उत्सर्जन 2026 की पहली छमाही में 3.7% बढ़ा। इसके अलावा, बिजली कंपनियों द्वारा नई कोयला क्षमता जोड़े जाने से संयंत्रों की उपयोग दर घटी है। विश्लेषकों का कहना है कि भारी उद्योगों का बढ़ता उत्सर्जन अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत के बिजली क्षेत्र से होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच लगभग स्थिर रहा है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में हुआ रिकॉर्ड विस्तार है, जिसने बिजली की बढ़ती मांग को पूरा कर लिया। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) द्वारा कार्बन ब्रीफ के लिए किए गए विश्लेषण के अनुसार, 50 वर्षों से अधिक समय में यह पहली बार है जब दो साल की अवधि में बिजली की कुल मांग बढ़ने के बावजूद कोयला आधारित बिजली उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई।
विश्लेषण बताता है कि इन दो वर्षों के दौरान बिजली की मांग में हुई सात प्रतिशत वृद्धि को पूरी तरह स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों ने पूरा किया। इस दौरान लगभग 63 से 70 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त स्वच्छ बिजली का उत्पादन हुआ। यह मात्रा स्विट्जरलैंड की कुल बिजली खपत के बराबर है। इस वृद्धि में सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा योगदान रहा, जिससे लगभग 44 टेरावाट-घंटे बिजली मिली।
इसके बाद पवन ऊर्जा से 13 टेरावाट-घंटे, जलविद्युत से आठ टेरावाट-घंटे और परमाणु ऊर्जा से सात टेरावाट-घंटे का योगदान हुआ। इस अवधि में भारत ने 77 गीगावाट सौर ऊर्जा, 11 गीगावाट पवन ऊर्जा और पांच गीगावाट जलविद्युत क्षमता जोड़ी। बिजली क्षेत्र का उत्सर्जन 2025 की पहली छमाही में सालाना आधार पर 2.2 प्रतिशत घटा, जबकि 2026 की पहली छमाही में इसमें 2.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
इस तरह दो वर्षों के दौरान कुल उत्सर्जन में कोई शुद्ध वृद्धि नहीं हुई। इसी अवधि में तेल और गैस की खपत में लगातार दो वर्षों तक गिरावट आई। हालांकि, देश का कुल कार्बन उत्सर्जन 2026 की पहली छमाही में सालाना आधार पर 3.7 प्रतिशत बढ़ा। इसकी प्रमुख वजह इस्पात और सीमेंट उत्पादन में तेज वृद्धि रही। ये दोनों उद्योग अब भारत के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 23 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं।
कोयला आधारित बिजली उत्पादन में वृद्धि रुकने के बावजूद बिजली कंपनियों ने लगभग 8.5 गीगावाट नई कोयला आधारित उत्पादन क्षमता जोड़ी। इसके कारण संयंत्रों की उपयोग दर में कमी आई और उपभोक्ताओं के लिए लागत बढ़ी।
विश्लेषकों का कहना है कि स्वच्छ ऊर्जा के तेजी से विस्तार ने बिजली क्षेत्र के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है। हालांकि, भारी उद्योगों से होने वाला उत्सर्जन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से निर्माण और रियल एस्टेट गतिविधियों से जुड़ा है।
दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक देश भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। देश में नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार यह साबित करता है कि बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कार्बन उत्सर्जन बढ़ाना अनिवार्य नहीं है। इस उपलब्धि को बनाए रखने के लिए बिजली ग्रिड के आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में निरंतर निवेश की जरूरत होगी।
इसके साथ ही उद्योगों को भी कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीकों की ओर ले जाना आवश्यक होगा।
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