पूर्वोत्तर भारत की स्वदेशी कृषि प्रणालियां (जैसे- अरुणाचल की धान-मछली प्रणाली, नागालैंड की जाबो और एल्डर आधारित खेती, तथा मेघालय की बांस ड्रिप सिंचाई) सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता और पारिस्थितिकी प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण हैं। हालांकि वर्तमान में जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और बदलते तापमान से इन पारंपरिक प्रणालियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं, लेकिन स्थानीय किसान पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जलवायु जागरूकता के मेल से इनके टिकाऊ और जलवायु-स्मार्ट विकल्प तलाश रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। पूर्वोत्तर भारत की स्वदेशी कृषि प्रणालियां केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिकी प्रबंधन का अद्भुत उदाहरण हैं। आठ राज्यों में रहने वाले 130 से अधिक जनजातीय समुदायों ने हजारों वर्षों के अनुभव से पर्वतीय और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र के अनुरूप ऐसी कृषि पद्धतियां विकसित की हैं, जिनमें सीमित प्राकृतिक संसाधनों का बेहद कुशल उपयोग होता है। इन पारंपरिक प्रणालियों में खेत, जंगल, जलस्रोत, पशुधन और स्थानीय जैव विविधता एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
यही कारण है कि पूर्वोत्तर की कृषि परंपराएं आज जलवायु परिवर्तन के दौर में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। अरुणाचल प्रदेश की जीरो घाटी में अपतानी समुदाय द्वारा अपनाई जाने वाली धान-मछली एकीकृत कृषि प्रणाली इसका शानदार उदाहरण है। इस व्यवस्था में धान के खेतों को नहरों के नेटवर्क के माध्यम से मछली पालन से जोड़ा जाता है।
धान के खेत एक छोटे पारिस्थितिक तंत्र की तरह काम करते हैं। मछलियों से मिलने वाले जैविक पोषक तत्व मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं, जबकि मछलियां खेतों में मौजूद कुछ हानिकारक कीटों को खाती हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है तथा एक ही क्षेत्र से धान और मछली दोनों का उत्पादन संभव होता है। नागालैंड के चाखेसांग समुदाय की जाबो प्रणाली को स्थानीय रूप से ‘पानी को पकड़ना’ कहा जाता है।
यह वन संरक्षण, वर्षाजल संचयन, पशुपालन और कृषि को एक ही व्यवस्था में जोड़ती है। पहाड़ियों के ऊपरी हिस्सों में स्थित जंगलों से बहने वाला वर्षाजल पहले संरक्षित टैंकों तक पहुंचता है, जहां मिट्टी और गाद को रोका जाता है। इसके बाद पानी पशुओं के बाड़ों से होकर गुजरता है, जिससे उसमें जैविक पोषक तत्व मिल जाते हैं। अंततः यही पानी घाटी में बने सीढ़ीदार धान के खेतों की सिंचाई करता है। इस तरह एक ही जलधारा का उपयोग जल संरक्षण, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और कृषि उत्पादन के लिए किया जाता है। मेघालय में खासी और जयंतिया समुदायों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली सदियों पुराने स्थानीय जल प्रबंधन ज्ञान का उदाहरण है।
इसमें बांस को काटकर और खोखला करके छोटी-छोटी नालियां बनाई जाती हैं, जिनके माध्यम से पहाड़ी जलधाराओं का पानी खेतों तक पहुंचाया जाता है। पूरी व्यवस्था गुरुत्वाकर्षण पर आधारित होती है। बांस की नलियों का नेटवर्क कई सौ मीटर तक पानी पहुंचा सकता है और पानी को बूंद-बूंद करके काली मिर्च, पान और अन्य फसलों की जड़ों तक पहुंचाता है।
इससे बिना बिजली या आधुनिक पंप के सीमित जल संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल किया जाता है। नागालैंड में अंगामी और कोन्याक समुदायों द्वारा अपनाई जाने वाली एल्डर आधारित कृषि-वनीकरण प्रणाली भी उल्लेखनीय है। किसान स्थानांतरित खेती वाले क्षेत्रों में Alnus nepalensis यानी एल्डर वृक्षों को संरक्षित रखते हैं। एल्डर वृक्ष मिट्टी में नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करते हैं।
इससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है और कुछ क्षेत्रों में खेती के बाद भूमि को लंबे समय तक परती छोड़ने की आवश्यकता कम हो सकती है। यह परंपरा जंगल और कृषि के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में झूम या स्थानांतरित खेती लंबे समय से प्रचलित रही है। इसमें अपेक्षाकृत छोटे वन क्षेत्र को साफ कर जैविक अवशेषों को जलाया जाता है और राख से मिलने वाले पोषक तत्वों का उपयोग कर मिश्रित फसलें उगाई जाती हैं।
कुछ मौसमों के बाद भूमि को पुनः प्राकृतिक रूप से विकसित होने के लिए छोड़ दिया जाता है। हालांकि, झूम खेती की स्थिरता काफी हद तक फॉलो अवधि, जनसंख्या दबाव और भूमि प्रबंधन पर निर्भर करती है। जब पर्याप्त समय तक भूमि को पुनर्जीवित होने का अवसर मिलता है, तो प्राकृतिक वनस्पति की वापसी संभव होती है; लेकिन छोटी होती फॉलो अवधि भूमि क्षरण का जोखिम बढ़ा सकती है।
पूर्वोत्तर की स्वदेशी कृषि का एक महत्वपूर्ण पहलू बहुफसली खेती है। किसान एक ही खेत में मक्का, बाजरा, कंद, फलियां और अन्य स्थानीय फसलों को साथ उगाते हैं। इससे किसी एक फसल के खराब होने की स्थिति में पूरी कृषि व्यवस्था के विफल होने का जोखिम कम होता है। इसी तरह फसल के अवशेष और जंगली घास को खेत से पूरी तरह हटाने के बजाय कई स्थानों पर वहीं छोड़ दिया जाता है।
इनके सड़ने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है और ढलानों पर नमी बनाए रखने में मदद मिलती है। भारी मानसूनी बारिश के दौरान यह प्राकृतिक आवरण मिट्टी के कटाव को कम करने में भी सहायक हो सकता है। कई समुदाय स्थानीय औषधीय पौधों, जंगली मिर्च की किस्मों और लकड़ी की राख से तैयार पारंपरिक मिश्रणों का इस्तेमाल कीटों को नियंत्रित करने के लिए करते हैं। ये तरीके स्थानीय पारिस्थितिकी और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित हैं।
जलवायु परिवर्तन ने इन सदियों पुरानी कृषि प्रणालियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। पूर्वोत्तर के कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर है। ऐसे में बारिश के समय, मात्रा और तीव्रता में बदलाव का सीधा असर खेती पर पड़ता है। झूम खेती के पारंपरिक कैलेंडर में बदलाव इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
मानसून से पहले बारिश का समय बदलने और लंबे शुष्क दौर आने से खेत साफ करने और जैविक अवशेष जलाने का पारंपरिक समय प्रभावित हो रहा है। गलत समय पर बारिश होने से पर्याप्त राख तैयार नहीं हो पाती, जिससे मिट्टी को मिलने वाले पोषक तत्वों का चक्र प्रभावित हो सकता है। मेघालय में बांस ड्रिप सिंचाई के लिए जरूरी पहाड़ी झरनों और छोटी जलधाराओं पर भी जलवायु परिवर्तन का दबाव बढ़ रहा है।
मानसून की बारिश कम अवधि में अत्यधिक तीव्र होने और शुष्क मौसम लंबा होने से कुछ पारंपरिक जलस्रोतों का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश की धान-मछली प्रणाली के लिए जरूरी उथले जल वाले खेतों में तापमान और जल उपलब्धता में बदलाव मछलियों के प्रजनन तथा धान उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन का असर पूर्वोत्तर की विशिष्ट फसलों पर भी दिखाई दे रहा है।
मेघालय के खासी मैंडरिन संतरे और सिक्किम की बड़ी इलायची जैसी महत्वपूर्ण फसलों को बदलते तापमान, नमी और नए कीट एवं रोगों से चुनौती मिल रही है। इसी दौरान सेब और कीवी जैसी फसलों के लिए उपयुक्त भौगोलिक क्षेत्र भी ऊंचाई की ओर खिसकने के संकेत दे रहे हैं। इससे उन किसानों को अपनी पारंपरिक खेती में बदलाव करने की आवश्यकता पड़ सकती है, जिनकी आजीविका लंबे समय से विशिष्ट ऊंचाई और जलवायु पर निर्भर रही है।
कम या अनियमित मानसूनी बारिश से बुआई की पारंपरिक समय-सारिणी प्रभावित होती है, जबकि कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश पहाड़ी ढलानों से उपजाऊ मिट्टी के बहाव को तेज कर सकती है। इससे खेतों की उत्पादकता और किसानों की आय दोनों पर दबाव बढ़ता है। इन चुनौतियों के बावजूद पूर्वोत्तर के किसान केवल आधुनिक तकनीकों पर निर्भर नहीं हैं।
कई समुदाय पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान और आधुनिक जलवायु जागरूकता को साथ लेकर स्थानीय समाधान विकसित कर रहे हैं। कीट प्रबंधन में जैव विविधता को बढ़ावा देना इसका एक उदाहरण है। खेतों में शिकारी कीटों, मकड़ियों और पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण बनाए रखने से प्राकृतिक जैविक नियंत्रण को बढ़ावा मिलता है। इससे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
बारिश की कमी की स्थिति में किसान पारंपरिक कंद, जंगली याम और कम पानी में उगने वाली बाजरा जैसी फसलों की ओर भी लौट रहे हैं। ये फसलें खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण वैकल्पिक आधार प्रदान करती हैं। मेघालय में बुन टेरेसिंग जैसे स्थानीय भूमि प्रबंधन उपायों को जैविक मल्च और अन्य स्थानीय सामग्रियों से मजबूत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य तेज मानसूनी बहाव से मिट्टी को बचाना और खेतों में नमी बनाए रखना है।
पूर्वोत्तर भारत की स्वदेशी कृषि प्रणालियां यह दिखाती हैं कि टिकाऊ खेती हमेशा आधुनिक मशीनों और महंगे इनपुट पर निर्भर नहीं होती। स्थानीय जलवायु, भूगोल, जैव विविधता और सामुदायिक ज्ञान को समझकर विकसित की गई पारंपरिक प्रणालियां संसाधनों के संरक्षण का प्रभावी आधार बन सकती हैं। आज आवश्यकता इन परंपराओं को केवल अतीत की विरासत के रूप में देखने की नहीं, बल्कि जलवायु-स्मार्ट कृषि के संभावित मॉडल के रूप में समझने की है।
वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को साथ लाकर पूर्वोत्तर भारत ऐसी कृषि प्रणालियों का उदाहरण पेश कर सकता है, जो खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ जंगल, मिट्टी और जल संसाधनों की रक्षा भी करें।
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