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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जैव-विविधता > सिर्फ बाघ नहीं, ये नौ प्रजातियां भी बचा सकती हैं भारत की जैव विविधता
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जैव-विविधता

सिर्फ बाघ नहीं, ये नौ प्रजातियां भी बचा सकती हैं भारत की जैव विविधता

Environment Pulse
Last updated: September 11, 2026 1:04 pm
Environment Pulse
Published: September 11, 2026
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Conservation Letters में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में जैव विविधता और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए केवल बाघों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सांभर, ढोल, तेंदुए और ग्रेट हॉर्नबिल जैसी नौ ‘एंकर प्रजातियों’ के आवासों का संरक्षण आवश्यक है। इनमें से कई प्रजातियों के आवास मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों से बाहर हैं, जिनके संरक्षण से 700 से अधिक वन्यजीव प्रजातियों और भारी कार्बन भंडार को बचाया जा सकता है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में जैव विविधता संरक्षण की रणनीति अब केवल बाघ जैसी लोकप्रिय प्रजातियों तक सीमित रखने के बजाय उन प्रजातियों के आवासों पर भी केंद्रित की जा सकती है, जिनके संरक्षण से एक साथ बड़ी संख्या में वन्यजीवों और प्राकृतिक कार्बन भंडार को बचाया जा सके।

Conservation Letters में प्रकाशित एक नए अध्ययन में नौ ऐसी “एंकर प्रजातियों” की पहचान की गई है, जिनके आवासों का संरक्षण जैव विविधता और जलवायु कार्रवाई दोनों के लिए महत्वपूर्ण लाभ दे सकता है। इन नौ प्रजातियों में सांभर, ढोल, किंग कोबरा, गौर, स्लॉथ भालू, भारतीय पैंगोलिन, ग्रेट हॉर्नबिल, बाघ और तेंदुआ शामिल हैं।

अध्ययन के अनुसार, इनमें से किसी एक प्रजाति के आवास की सुरक्षा भारत में 700 से अधिक स्तनधारी, पक्षी और सरीसृप प्रजातियों के संरक्षण में मदद कर सकती है। साथ ही, करीब 1.1 गीगाटन ऊपर-जमीन कार्बन भंडार को भी सुरक्षित रखा जा सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि सांभर, तेंदुए और ढोल के आवास विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

इन तीन प्रजातियों के आवासों में भारत के आधे से अधिक ऊपर-जमीन कार्बन और करीब आधी सह-अस्तित्व वाली प्रजातियों को संरक्षण मिलने की संभावना है। अकेले सांभर के आवास में अनुमानित 3.12 गीगाटन ऊपर-जमीन कार्बन मौजूद है। यह अध्ययन ऐसे समय सामने आया है जब भारत के सामने 2030 तक 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षण देने वाले वैश्विक 30×30 लक्ष्य को हासिल करने की चुनौती है।

शोध के मुताबिक, देश की करीब 5 प्रतिशत भूमि ही वर्तमान में औपचारिक रूप से संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क के अंतर्गत आती है। ऐसे में एंकर प्रजातियों के आवासों की सुरक्षा संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार का एक प्रभावी आधार बन सकती है। अध्ययन में 2,000 से अधिक कशेरुकी प्रजातियों के आवासों का उच्च-रिजॉल्यूशन मानचित्रण किया गया और इनमें से 160 ऐसी प्रजातियों का विश्लेषण किया गया जो वन्यजीव संरक्षण कानून की अनुसूची-I में संरक्षित हैं तथा आईयूसीएन की सूची में संकटग्रस्त या असुरक्षित श्रेणी में हैं।

शोध में यह भी सामने आया कि एंकर प्रजातियों के बड़े हिस्से के आवास मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों के बाहर हैं। सांभर के 90.7 प्रतिशत, ढोल के 88.2 प्रतिशत और तेंदुए के 75.1 प्रतिशत आवास संरक्षित क्षेत्रों से बाहर पाए गए। इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों को संरक्षण के दायरे में लाने से जैव विविधता के साथ-साथ कार्बन भंडार को भी बड़ा लाभ मिल सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञों ने चेताया है कि इस मॉडल को सभी पारिस्थितिकी तंत्रों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। तेंदुआ जंगलों के साथ-साथ घासभूमि, अर्ध-शुष्क क्षेत्रों और मानव बस्तियों के आसपास भी पाया जाता है, जबकि सांभर उच्च गुणवत्ता वाले घने जंगलों पर अधिक निर्भर रहता है। इसलिए भविष्य में अधिक सूक्ष्म स्तर की मैपिंग और अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्रों के स्वतंत्र आकलन की जरूरत होगी। विशेषज्ञों ने यह भी चिंता जताई कि कार्बन और जैव विविधता को एक साथ मापने वाला मॉडल अनजाने में वनों को घासभूमि और शुष्क क्षेत्रों की तुलना में अधिक महत्व दे सकता है।

इससे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसी गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियां संरक्षण की प्राथमिकताओं में पीछे रह सकती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, एंकर प्रजातियों पर आधारित संरक्षण मॉडल भारत में जैव विविधता संरक्षण और जलवायु लक्ष्यों को एक साथ आगे बढ़ाने का नया रास्ता खोल सकता है।

संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार के साथ इको-टूरिज्म और वन्यजीव सफारी से आर्थिक संसाधन जुटाने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। यह मॉडल संरक्षण को केवल एक प्रजाति बचाने की कवायद से आगे ले जाकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, कार्बन भंडार और जलवायु कार्रवाई से जोड़ सकता है।

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