संयुक्त राष्ट्र की एक नई वैश्विक रिपोर्ट (‘नेचर’स कमबैक’) के अनुसार, वर्ष 2030 तक पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के निर्धारित लक्ष्य का अब तक केवल 25 प्रतिशत ही हासिल हो पाया है। FAO, UNEP और जैव विविधता अभिसमय सचिवालय द्वारा जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया भर में 1 अरब हेक्टेयर के संकल्प के मुकाबले केवल 25.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि ही बहाली के दायरे में आ पाई है। इस दिशा में एशिया (विशेषकर चीन) की हिस्सेदारी सबसे आगे (लगभग 76%) है, जबकि मीठे पानी और समुद्री तंत्र के प्रयास अभी भी बहुत पीछे हैं। UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने चेतावनी दी है कि लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मौजूदा रफ्तार को तीन गुना बढ़ाना होगा और वार्षिक वैश्विक वित्तपोषण को 64 अरब डॉलर से बढ़ाकर 296 अरब डॉलर करना होगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : दुनिया भर में पर्यावरण और जैव विविधता संरक्षण के प्रयासों के बावजूद पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली की रफ्तार निर्धारित लक्ष्यों से काफी पीछे है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक बहाल किए जाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र के कुल निर्धारित लक्ष्य का अब तक केवल 25 प्रतिशत ही हासिल हो पाया है।
ऐसे में देशों के पास अपने वादों को पूरा करने के लिए समय लगातार कम होता जा रहा है। नेचर’स कमबैक – स्केलिंग इकोसिस्टम रेस्टोरेशन फॉर पीपल एंड प्लैनेट शीर्षक वाली यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और जैव विविधता अभिसमय सचिवालय ने संयुक्त रूप से जारी की।
आकलन के मुताबिक, वर्तमान में दुनिया भर में लगभग 25.2 करोड़ हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाली के दायरे में लाया गया है। यह उस एक अरब हेक्टेयर क्षेत्र का करीब 25 प्रतिशत है, जिसे देशों ने संयुक्त राष्ट्र के पारिस्थितिकी तंत्र बहाली दशक (2021-2030) और अन्य वैश्विक प्रतिबद्धताओं के तहत पुनर्स्थापित करने का संकल्प लिया था। आर्मेनिया की राजधानी येरेवन में आयोजित जैव विविधता सम्मेलन COP17 के दौरान प्रस्तुत यह रिपोर्ट दशक के मध्य तक हुई प्रगति का आकलन करती है।
इसका उद्देश्य कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के उस लक्ष्य की समीक्षा करना है, जिसके तहत 2030 तक कम से कम 30 प्रतिशत क्षतिग्रस्त स्थलीय, मीठे पानी, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावी बहाली के दायरे में लाना है।
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में दर्ज कुल पारिस्थितिकी बहाली प्रयासों में एशिया की हिस्सेदारी लगभग 76 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में करीब 18.5 से 19.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली के दायरे में हैं। अकेले चीन ने 12.7 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में बहाली के प्रयासों की जानकारी दी है। अफ्रीका लगभग 14 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि यूरोप, अमेरिका और ओशिनिया में बहाली के प्रयास अपेक्षाकृत धीमे हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न स्वरूपों में भी असमानता सामने आई है।
बहाली के दायरे में शामिल कुल क्षेत्र का लगभग 92 प्रतिशत हिस्सा स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र है। मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र की हिस्सेदारी केवल चार प्रतिशत यानी करीब 1.1 करोड़ हेक्टेयर है। वहीं समुद्री और तटीय क्षेत्रों में लगभग 57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ही बहाली के प्रयासों में शामिल हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने चेतावनी दी है कि दुनिया प्रकृति को उस स्तर और गति से पुनर्स्थापित नहीं कर रही है, जिसकी आवश्यकता है। वर्ष 2030 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए मौजूदा बहाली प्रयासों की रफ्तार लगभग तीन गुना बढ़ानी होगी। रिपोर्ट में वित्तीय निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
इसके मुताबिक, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए वार्षिक वैश्विक वित्तपोषण को मौजूदा लगभग 64 अरब डॉलर से बढ़ाकर 296 अरब डॉलर करना होगा। इसके लिए ऐसी अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है, जिनमें प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी सेवाओं के वास्तविक महत्व को आर्थिक नीतियों में जगह मिले। रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि अब तक बहाली के दायरे में आए 25.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र का प्रयास वैश्विक स्तर पर दर्ज सबसे बड़ा अभियान है।
इससे 10 लाख से अधिक हरित रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं। हालांकि, किसी क्षेत्र को बहाली के दायरे में शामिल करना उसके पूरी तरह पारिस्थितिक रूप से स्वस्थ हो जाने की गारंटी नहीं है। कई क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षरण की गति अब भी बहाली के प्रयासों से अधिक बनी हुई है।
संयुक्त राष्ट्र ने सरकारों से राजनीतिक प्रतिबद्धता मजबूत करने, पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी बेहतर बनाने, विशेष रूप से जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर ध्यान देने और आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों के भूमि अधिकार सुरक्षित करने की अपील की है। इसके साथ ही सार्वजनिक और निजी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता बताई गई है। वर्ष 2030 की समयसीमा में अब चार साल से भी कम समय शेष है।
ऐसे में रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जैव विविधता के नुकसान को रोकने और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए मौजूदा प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। लक्ष्य हासिल करने के लिए वैश्विक स्तर पर तत्काल और व्यापक कार्रवाई जरूरी है।
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