मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में साल (Shorea robusta) के वनों पर सैल बोरर (Hoplocerambyx spinicornis) कीट के गंभीर प्रकोप के कारण लगभग 1.47 लाख संक्रमित पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है। यह कीट पेड़ों के तनों को अंदर से नुकसान पहुंचाता है, जिससे गंभीर स्थिति में पेड़ सूख जाते हैं। वन विभाग संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ-साथ वयस्क कीटों को पकड़ने और रासायनिक व जैविक नियंत्रण के उपाय कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों ने इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता जताते हुए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक वन प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले में साल के जंगलों पर सैल बोरर नामक कीट के प्रकोप ने वन संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लगभग 1.47 लाख प्रभावित साल के पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है।
वन विभाग का कहना है कि संक्रमित पेड़ों को हटाने और वयस्क कीटों को पकड़ने से प्रकोप पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, डिंडोरी जिले के पूर्वी करंजिया, पश्चिमी करंजिया और समनापुर वन क्षेत्रों में लगभग 30,344 हेक्टेयर वन क्षेत्र इस संक्रमण से प्रभावित है। केंद्र सरकार ने 1,46,784 संक्रमित साल के पेड़ों को हटाने की मंजूरी दी है। वन विभाग के उत्पादन प्रभाग की संभागीय वन अधिकारी भारती ठाकरे के अनुसार, बारिश के कारण काम प्रभावित हुआ है।
विभाग ने मार्च 2027 तक कटाई पूरी करने की योजना बनाई है। साल बोरर का वैज्ञानिक नाम Hoplocerambyx spinicornis है। यह लॉन्गहॉर्न बीटल समूह का कीट है, जो साल (Shorea robusta) के तनों में छेद करके अंदरूनी लकड़ी को नुकसान पहुंचाता है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में पेड़ सूखकर मर सकता है। यह कीट आम तौर पर कमजोर पेड़ों पर हमला करता है, लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में अलग-अलग उम्र के पेड़ों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। बड़े और परिपक्व पेड़ों को इसके प्रकोप से भारी क्षति होने का खतरा रहता है।
वन विभाग संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ वयस्क कीटों को पकड़ने का अभियान भी चला रहा है। इसके तहत कुछ चुने हुए पेड़ों को काटकर उनकी छाल हटाई जाती है, जिससे निकलने वाला रस कीटों को आकर्षित करता है। एकत्र हुए कीटों को बाद में ग्रामीणों की मदद से पकड़ा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग की इस पहल के तहत एकत्र किए गए प्रत्येक कीट के लिए दो रुपये दिए जाते हैं।
संबंधित मौसम में 19 लाख से अधिक कीट पकड़े गए, जिसके बदले लगभग 38.5 लाख रुपये का भुगतान किया गया। अधिकारियों का मानना है कि प्रजनन से पहले वयस्क कीटों को पकड़ने से उनकी संख्या नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, जिन पेड़ों को संक्रमण के कारण बचाना संभव नहीं है, उन्हें हटाने का उद्देश्य संक्रमण के प्रसार के स्रोतों को कम करना है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार, केवल संक्रमित पेड़ों की कटाई पर्याप्त नहीं होगी।
पूरे वर्ष निगरानी, शुरुआती पहचान और रोकथाम के उपाय भी जरूरी हैं। साल बोरर का हमला भारत के लिए नई समस्या नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, देश में इसके 21 से अधिक बड़े प्रकोप दर्ज किए जा चुके हैं। वर्ष 1997 से 2000 के बीच मध्य प्रदेश और पड़ोसी छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर संक्रमण फैला था, जिससे लगभग तीन लाख हेक्टेयर साल वन प्रभावित हुए थे। डिंडोरी से सटे मंडला जिले में उस समय विशेष रूप से गंभीर स्थिति रही थी।
डिंडोरी के वन अनुविभागीय अधिकारी सुरेंद्र जाटव ने मौजूदा प्रकोप को असामान्य रूप से गंभीर बताया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रकोप लगभग 30 वर्षों के अंतराल पर दोबारा उभर सकते हैं, हालांकि इसके पीछे काम करने वाले कारणों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है। जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ शोध अधिकारी डॉ. उदय होमकर के अनुसार, पिछले वर्ष डिंडोरी-मंडला क्षेत्र में असामान्य रूप से अधिक बारिश ने कीट के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार की होंगी।
उन्होंने संक्रमण की शुरुआती पहचान को प्रभावी नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, प्राकृतिक शत्रुओं के इस्तेमाल जैसे जैविक नियंत्रण के विकल्पों पर भी विचार किया जाना चाहिए। वहीं, मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक और भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के पूर्व निदेशक राम प्रसाद ने इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से पहले स्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन और विशेषज्ञों से परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने संक्रमण के कुछ खास क्षेत्रों में अधिक फैलने के कारणों की जांच करने और आकलन रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई है।
साल के जंगल मध्य भारत के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में फैले ये वन वन्यजीवों को आवास देने, मिट्टी और पानी को संरक्षित रखने तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। साल की लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्यों में होता है, जबकि इसके बीज, पत्ते और राल से भी ग्रामीण और आदिवासी समुदायों को आर्थिक लाभ मिलता है। इन वनों का कई जनजातीय समुदायों के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में भी विशेष स्थान है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से वन की निचली वनस्पतियों, झाड़ियों और छोटे पौधों पर भी असर पड़ सकता है।
बार-बार लगने वाली आग और अत्यधिक चराई जैसी समस्याएं पहले ही कुछ क्षेत्रों में वनस्पति की निचली परत को कमजोर कर सकती हैं, जिससे मिट्टी का कटाव और पानी रोकने की क्षमता प्रभावित होती है। वन विशेषज्ञों के मुताबिक, कीट संक्रमण के साथ वन संरचना में हो रहे बदलावों, अन्य वृक्ष प्रजातियों की स्थिति और जंगलों के समग्र स्वास्थ्य का भी अध्ययन किया जाना चाहिए।
साल बोरर पर नियंत्रण के लिए संक्रमित पेड़ों को हटाना एक उपाय हो सकता है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए वैज्ञानिक निगरानी, समय रहते रोकथाम, जैविक नियंत्रण और व्यापक वन प्रबंधन को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।
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