तुर्किये के अंताल्या में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP31) की तैयारियां जोरों पर हैं, जिसका मुख्य फोकस जलवायु लक्ष्यों को केवल घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें वास्तविक परियोजनाओं, निवेश और जमीनी परिणामों में बदलना है। सम्मेलन के नामित अध्यक्ष मुरात कुरुम द्वारा जारी रूपरेखा के अनुसार, इसमें स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, शून्य अपशिष्ट, मीथेन कटौती, जलवायु-सक्षम शहर, हरित औद्योगिकीकरण, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रणालियों जैसे 10 प्रमुख प्राथमिकता वाले विषय तय किए गए हैं। साथ ही, विकासशील देशों के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधन जुटाने तथा राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं व क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटने के लिए ‘क्लाइमेट इंप्लीमेंटेशन ब्रिज’ पर विशेष जोर दिया जाएगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। तुर्किये के अंताल्या में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP31 की तैयारियां तेज हो गई हैं। सम्मेलन की अध्यक्षता की रूपरेखा सामने रखते हुए COP31 के नामित अध्यक्ष मुरात कुरुम ने जलवायु कार्रवाई को जमीन पर उतारने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों के लिए वित्तीय एवं तकनीकी संसाधन जुटाने को प्राथमिकता दी है।
COP31 की अध्यक्षता की ओर से 24 अगस्त 2026 को जारी तीसरे पत्र में सम्मेलन के प्रमुख विषयों, थीमैटिक डेज और सम्मेलन से पहले होने वाली महत्वपूर्ण बैठकों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है।
इसमें COP31 Action Agenda को व्यावहारिक क्रियान्वयन का मंच बताया गया है, जिसका उद्देश्य साझेदारियों को मजबूत करना, ऐसे समाधान आगे बढ़ाना जिन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जा सके, वित्त और निवेश को सक्रिय करना तथा लोगों, अर्थव्यवस्थाओं और पारिस्थितिक तंत्रों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना है।
यह एजेंडा ब्राजील के बेलेम में आयोजित COP30 में शुरू की गई वैश्विक जलवायु कार्रवाई की पांच वर्षीय दृष्टि से भी जुड़ा हुआ है। COP31 की अध्यक्षता का जोर इस बात पर है कि जलवायु लक्ष्यों को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें वास्तविक परियोजनाओं, निवेश और स्थानीय स्तर पर दिखाई देने वाले परिणामों में बदला जाए।
COP31 की अध्यक्षता ने जलवायु कार्रवाई के लिए दस प्रमुख प्राथमिकता वाले विषय तय किए हैं। इनमें स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और विद्युतीकरण, शून्य अपशिष्ट और मीथेन उत्सर्जन में कमी, जलवायु-सक्षम शहर, हरित औद्योगिकीकरण, युवा एवं शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, महासागर एवं समुद्र, जलवायु-सक्षम स्वास्थ्य प्रणालियां, रियो कन्वेंशन के बीच बेहतर तालमेल और Climate Implementation Bridge शामिल हैं।
स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और विद्युतीकरण के तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के साथ ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा की वहनीयता को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युतीकरण और स्वच्छ तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाने को आर्थिक विकास, रोजगार और ऊर्जा पहुंच से जोड़ने की कोशिश होगी। जीरो वेस्ट और मीथेन उत्सर्जन में कमी भी COP31 के महत्वपूर्ण एजेंडे में शामिल है।
बढ़ता कचरा प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्रों पर दबाव बढ़ा रहा है। ऐसे उत्पादन और उपभोग मॉडल को बढ़ावा देने पर जोर रहेगा, जिनमें संसाधनों का अधिक कुशल इस्तेमाल हो और कचरे का उत्पादन कम से कम किया जा सके। मीथेन उत्सर्जन में कमी को भी जलवायु परिवर्तन की गति धीमी करने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच शहरों को अधिक लचीला बनाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। हीटवेव, बाढ़, जल संकट और अन्य चरम मौसम की घटनाओं के जोखिम को देखते हुए मजबूत बुनियादी ढांचे, टिकाऊ आवास, कम-कार्बन परिवहन और जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन को आगे बढ़ाने की कोशिश होगी। औद्योगिक क्षेत्र में कम-कार्बन तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी COP31 की प्राथमिकताओं में है।
हरित औद्योगिकीकरण के माध्यम से उन क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने पर ध्यान दिया जाएगा जहां कार्बन उत्सर्जन घटाना अपेक्षाकृत कठिन है। लक्ष्य ऐसी औद्योगिक अर्थव्यवस्था विकसित करना है जो प्रतिस्पर्धी, जलवायु जोखिमों के प्रति मजबूत और कम-कार्बन आधारित हो। जलवायु कार्रवाई को अगली पीढ़ी से जोड़ते हुए युवा और शिक्षा को भी एजेंडे में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। बच्चों, युवाओं और भविष्य के कार्यबल को जलवायु परिवर्तन से संबंधित ज्ञान, कौशल और अवसर उपलब्ध कराने पर जोर रहेगा। खासकर जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था से स्वच्छ अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण के दौरान नए कौशल और रोजगार के अवसर विकसित करना आवश्यक माना जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन का कृषि और खाद्य सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पड़ता है। सूखा, अत्यधिक वर्षा, बढ़ता तापमान और जल संकट कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। COP31 में जलवायु-सक्षम कृषि प्रणालियों, बेहतर जल प्रबंधन और जल, खाद्य एवं कृषि के बीच समन्वित नीतियों को बढ़ावा देने की कोशिश होगी। महासागर और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं। समुद्र के बढ़ते तापमान और तटीय क्षेत्रों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए समुद्री तथा तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों की जलवायु-सहनशीलता मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी तेजी से दिखाई दे रहा है। हीटवेव, बाढ़, वायु प्रदूषण और अन्य चरम मौसम की घटनाएं स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। इसी कारण ऐसी स्वास्थ्य प्रणालियों के विकास पर जोर होगा जो जलवायु संबंधी संकटों का सामना करने में सक्षम हों और समाज के सभी वर्गों के लिए समान रूप से सुलभ रहें। रियो सिनर्जीज के तहत जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और भूमि संरक्षण से जुड़े वैश्विक प्रयासों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। इन क्षेत्रों की चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हैं और अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत चल रही पहलों में बेहतर समन्वय से अधिक प्रभावी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
COP31 का Climate Implementation Bridge राष्ट्रीय जलवायु महत्वाकांक्षाओं और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य देशों की जलवायु और विकास प्राथमिकताओं को ऐसे परियोजना पोर्टफोलियो में बदलना है जिन्हें वित्तीय सहायता और निवेश के लिए तैयार किया जा सके। इससे विकासशील देशों को अपनी जलवायु योजनाओं को ठोस परियोजनाओं में बदलने में मदद मिल सकती है। इन सभी प्राथमिकताओं के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण को साझा आधार के रूप में रेखांकित किया गया है।
जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केवल राजनीतिक प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं होगी। विकासशील देशों को स्वच्छ तकनीक अपनाने, जलवायु-सक्षम बुनियादी ढांचा तैयार करने और आपदा जोखिम कम करने के लिए पर्याप्त वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग की आवश्यकता होगी। COP31 के दौरान होने वाले Thematic Days विभिन्न क्षेत्रों की पहलों को सामने लाने, सफल अनुभव साझा करने और नई साझेदारियां बनाने का अवसर प्रदान करेंगे। इनमें खाद्य, कृषि और स्वास्थ्य, ऊर्जा और परिवहन, जीरो वेस्ट, जलवायु-सक्षम शहर और निर्मित पर्यावरण, वित्त और व्यापार, बच्चे एवं युवा, शिक्षा और कौशल, विज्ञान, उद्योग और प्रौद्योगिकी, रियो सिनर्जीज, मानव एवं सामाजिक विकास तथा जलवायु कार्रवाई के क्रियान्वयन को मजबूत करने जैसे विषय शामिल होंगे।
अंताल्या सम्मेलन से पहले भी कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय बैठकें COP31 Action Agenda को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाएंगी। इनमें इस्तांबुल क्लाइमेट फाइनेंस समिट, ओशन एंड सीज समिट, UNFCCC Climate Week 4, Climate Week NYC और फिजी में होने वाली Pre-COP बैठक शामिल हैं। इन बैठकों के माध्यम से देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, निजी क्षेत्र और अन्य हितधारकों के बीच संवाद को मजबूत करने तथा COP31 के दौरान सामने आने वाली पहलों की तैयारी करने का प्रयास होगा। COP31 के दौरान 11 और 12 नवंबर को Leaders’ Summit आयोजित किया जाएगा। COP31 अध्यक्षता ने इसे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में तालमेल बनाने, नई साझेदारियों को गति देने और बहुपक्षीय जलवायु कार्रवाई में विश्वास मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण मंच बताया है।
यह बैठक ऐसे समय में होगी जब वैश्विक जलवायु नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को वास्तविक क्रियान्वयन में बदलना है। COP31 की अध्यक्षता ने उन देशों से अपने Biennial Transparency Reports यानी BTRs जमा करने का आग्रह किया है जिन्होंने अभी तक इन्हें प्रस्तुत नहीं किया है। इसके साथ ही देशों से 2030 के बाद की अवधि के लिए अपनी Nationally Determined Contributions यानी NDCs प्रस्तुत करने की अपील की गई है। पेरिस समझौते के तहत पारदर्शिता और राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों की नियमित जानकारी साझा करना वैश्विक प्रगति का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है। COP31 की अध्यक्षता ने कहा है कि सम्मेलन की तैयारियों के दौरान देशों के साथ परामर्श खुलेपन, पारदर्शिता और समावेशिता की भावना के साथ जारी रहेगा।
उद्देश्य विश्वास बढ़ाना, संवाद को सुगम बनाना और संतुलित तथा सर्वसम्मति आधारित परिणाम हासिल करना है। COP31 का व्यापक एजेंडा संकेत देता है कि वैश्विक जलवायु वार्ता अब केवल दीर्घकालिक लक्ष्यों और उत्सर्जन कटौती की घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहती। इस बार वास्तविक परियोजनाओं, वित्तीय संसाधनों, तकनीकी सहयोग और स्थानीय स्तर पर परिणाम देने वाले उपायों पर अधिक जोर दिखाई दे रहा है। अंताल्या में होने वाला सम्मेलन स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु-सक्षम शहरों, खाद्य एवं जल सुरक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, महासागर और जैव विविधता जैसे मुद्दों को साझा जलवायु एजेंडे से जोड़ने की कोशिश करेगा।
COP31 की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि इन प्राथमिकताओं को किस हद तक ठोस वित्त, निवेश, तकनीक और देशों की राष्ट्रीय नीतियों से जोड़ा जा सकता है। यदि Action Agenda को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह जलवायु प्रतिबद्धताओं और जमीनी कार्रवाई के बीच की खाई को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

