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जंगल

ग्रेट निकोबार मेगा परियोजना क्षेत्र में हजारों विशाल पेड़ों पर संकट, सैटेलाइट आंकड़ों ने बढ़ाई पर्यावरणीय चिंता

Environment Pulse
Last updated: October 31, 2026 8:00 pm
Environment Pulse
Published: October 31, 2026
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अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित 80,000 से 81,000 करोड़ रुपये की मेगा विकास परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएँ गहरी हो गई हैं। सैटेलाइट आंकड़ों के नए विश्लेषण से पता चला है कि इस 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 35 से 64 मीटर (लगभग 19-21 मंजिला इमारत के बराबर) तक ऊंचे हजारों विशाल पेड़ और प्राचीन उष्णकटिबंधीय वर्षावन मौजूद हैं। सरकारी अनुमान के अनुसार इस परियोजना के तहत लगभग 7.11 लाख पेड़ काटे जाने की संभावना है, जिससे न केवल क्षेत्र की विशिष्ट जैव विविधता और लेदरबैक कछुओं के प्रजनन स्थल बल्कि शोम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदायों की पारंपरिक जीवनशैली भी खतरे में पड़ सकती है। हालांकि सरकार और नियामक संस्थाएं इसे रणनीतिक व आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण बता रही हैं, लेकिन पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इन विशाल वृक्षों के नष्ट होने से कार्बन भंडारण और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित मेगा विकास परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ गई हैं। सैटेलाइट से प्राप्त वनस्पति छत्र (कैनोपी) की ऊंचाई के आंकड़ों के नए विश्लेषण में परियोजना क्षेत्र के भीतर हजारों विशाल वन वृक्षों और प्राकृतिक आवासों की मौजूदगी सामने आई है।

इससे इस क्षेत्र में संभावित वन विनाश और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। करीब 80,000 से 81,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना में गलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, ग्रीनफील्ड दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र और एक विशाल एकीकृत टाउनशिप विकसित करने की योजना है। परियोजना का कुल क्षेत्रफल लगभग 166 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से करीब 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को अन्य उपयोगों के लिए हस्तांतरित करने की मंजूरी दी गई है।

सैटेलाइट आंकड़ों के विश्लेषण में परियोजना क्षेत्र के भीतर 16,500 से अधिक ऐसे स्थानों की पहचान की गई है, जहां 35 से 64 मीटर ऊंचाई वाले एक या अधिक पेड़ों के समूह मौजूद हैं। इनमें लगभग 1,700 स्थानों पर 43 मीटर या उससे अधिक ऊंचे पेड़ पाए गए हैं, जबकि करीब 200 स्थानों पर 50 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले वृक्ष मौजूद हैं। कुछ पेड़ों की अनुमानित ऊंचाई 64 मीटर तक बताई गई है, जो लगभग 19 से 21 मंजिला इमारत के बराबर है।

यह विश्लेषण मुख्य रूप से 2018 से 2020 के बीच उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों पर आधारित है। आंकड़े इस क्षेत्र में पुराने और अपेक्षाकृत कम प्रभावित उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की मौजूदगी की ओर संकेत करते हैं। सरकारी आकलन के अनुसार, पूरी परियोजना के दायरे में लगभग 18.65 लाख पेड़ हैं। इनमें से विभिन्न निर्माण चरणों में करीब 7.11 लाख पेड़ों को काटे जाने की संभावना है। हालांकि, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े आलोचकों और स्वतंत्र विश्लेषणों का कहना है कि पुराने और घने जंगलों की वास्तविक स्थिति को देखते हुए प्रभावित होने वाले पेड़ों की संख्या अधिक भी हो सकती है। सैटेलाइट विश्लेषण में पहचाने गए विशाल पेड़ बंदरगाह, हवाई अड्डे, टाउनशिप, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और रक्षा बुनियादी ढांचे के लिए निर्धारित क्षेत्रों में फैले हुए हैं।

पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि विशाल वृक्षों और उनसे जुड़े प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने से कार्बन भंडारण, स्थानीय जलचक्र, मिट्टी की स्थिरता और द्वीप की विशिष्ट जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। ग्रेट निकोबार में कई स्थानिक प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र संकटग्रस्त लेदरबैक समुद्री कछुओं के महत्वपूर्ण प्रजनन और घोंसले बनाने वाले स्थलों के लिए भी जाना जाता है। परियोजना को लेकर शोम्पेन और निकोबारी आदिवासी समुदायों की पारंपरिक भूमि, जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की गई हैं।

परियोजना के समर्थकों और संबंधित नियामक संस्थाओं का कहना है कि इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के निकट भारत की समुद्री संपर्क व्यवस्था और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करना है। इसके साथ ही प्रवाल भित्तियों के स्थानांतरण, प्रजातियों के संरक्षण और क्षतिपूरक पर्यावरणीय उपायों जैसी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया गया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने निर्धारित शर्तों के सख्त अनुपालन के अधीन परियोजना को आगे बढ़ने की अनुमति दी है। परियोजना का क्रियान्वयन विभिन्न चरणों में वर्ष 2047 तक प्रस्तावित है। ऐसे में सैटेलाइट विश्लेषण ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम करने की चुनौती को फिर सामने ला दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में जमीन पर वास्तविक स्थिति का सत्यापन, पेड़ों के संरक्षण की पारदर्शी निगरानी और प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।

ग्रेट निकोबार का वर्षावन केवल वन संपदा नहीं, बल्कि द्वीप की जलवायु, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र है।

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