By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
Environment PulseEnvironment PulseEnvironment Pulse
Notification Show More
Font ResizerAa
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Reading: जींस की कीमत: फैशन से पर्यावरण तक बदल रही डेनिम की कहानी
Share
Font ResizerAa
Environment PulseEnvironment Pulse
  • ईको सिस्टम
  • कचरा-प्रबंधन
  • फ्यूचर ग्रीन
  • ओपिनियन
  • मल्टीमीडिया
Search
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Have an existing account? Sign In
Follow US
Environment Pulse > फ्यूचर ग्रीन > सस्टेनिबिलिटी > जींस की कीमत: फैशन से पर्यावरण तक बदल रही डेनिम की कहानी
सस्टेनिबिलिटी

जींस की कीमत: फैशन से पर्यावरण तक बदल रही डेनिम की कहानी

Environment Pulse
Last updated: September 10, 2026 12:18 am
Environment Pulse
Published: September 10, 2026
Share
SHARE

फैशन उत्पाद के स्थापित ब्रांड और उपभोक्ता अब केवल कीमत और डिजाइन ही नहीं, बल्कि उत्पाद की ट्रेसबिलिटी, पारदर्शिता, टिकाऊपन और पर्यावरणीय प्रभाव पर भी ध्यान दे रहे हैं। ट्यूनीशिया स्थित गोंसर ग्रुप के सस्टेनेबिलिटी मैनेजर बिलेल बेन मिलेड़ के मुताबिक, फैशन उद्योग पर टिकाऊ उत्पादन अपनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कंपनियों को ऐसे उत्पाद तैयार करने की जरूरत महसूस हो रही है जिनका पर्यावरण पर प्रभाव कम हो। गोंसर डेनिम रिवोल्यूशन में डेनिम के रंग और विशेष प्रभाव तैयार करने के लिए लंबे समय से इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क

जींस आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय परिधानों में शामिल है। खेतों में काम करने वालों से लेकर कॉलेज परिसरों, त्योहारों और हाई-फैशन रैंप तक, डेनिम ने सीमाओं, वर्गों और पीढ़ियों को पार कर अपनी जगह बनाई है।

लेकिन जिस साधारण कपड़े को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है, उसके पीछे प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा, रसायनों, पानी और वैश्विक परिवहन की एक जटिल श्रृंखला काम करती है।

1873 में कारोबारी लेवी स्ट्रॉस ने कामगारों की पैंट की जेबों को मजबूत करने के लिए कॉपर रिवेट्स का पेटेंट कराया था। इसके बाद नीली जींस ने धीरे-धीरे वैश्विक फैशन का रूप ले लिया। आज सवाल यह है कि क्या डेनिम उद्योग पर्यावरण की सीमाओं के भीतर रहकर भी अपनी लोकप्रियता बनाए रख सकता है?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई डॉक्यूमेंट्री में मॉडल और UNEP गुडविल एंबेसडर एम्बर वैलेटा ने ट्यूनीशिया की डेनिम फैक्ट्रियों का दौरा कर इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की। उन्होंने वहां कपड़े के निर्माण में अपनाई जा रही पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों और टिकाऊ उत्पादन प्रक्रियाओं को करीब से देखा।

फैशन और टेक्सटाइल उद्योग दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल है। यह जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने के साथ-साथ बड़ी मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करता है। डेनिम विशेष रूप से संसाधन-गहन उत्पाद है। लेवी स्ट्रॉस के एक आकलन के मुताबिक, एक जोड़ी जींस तैयार करने में करीब 3,800 लीटर पानी तक खर्च हो सकता है। इसके अलावा जींस को अलग-अलग रंग और विशेष प्रभाव देने के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और रसायनों की जरूरत पड़ती है।

एशिया दुनिया में डेनिम के प्रमुख उत्पादन केंद्रों में है, लेकिन ट्यूनीशिया भी यूरोपीय संघ को तैयार डेनिम कपड़ों की आपूर्ति करने वाले महत्वपूर्ण देशों में शामिल है।

यूरोप के करीब होने के कारण ट्यूनीशियाई निर्माता कम समय में फैशन ब्रांडों की मांग पूरी कर सकते हैं। यूरोपीय बाजार में पर्यावरणीय मानकों को लेकर बढ़ती सख्ती का असर ट्यूनीशियाई फैक्ट्रियों पर भी दिखाई दे रहा है।

अब ब्रांड और उपभोक्ता केवल कीमत और डिजाइन ही नहीं, बल्कि उत्पाद की ट्रेसबिलिटी, पारदर्शिता, टिकाऊपन और पर्यावरणीय प्रभाव पर भी ध्यान दे रहे हैं। ट्यूनीशिया स्थित गोंसर ग्रुप के सस्टेनेबिलिटी मैनेजर बिलेल बेन मिलेड़ के मुताबिक, उद्योग पर टिकाऊ उत्पादन अपनाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कंपनियों को ऐसे उत्पाद तैयार करने की जरूरत महसूस हो रही है जिनका पर्यावरण पर प्रभाव कम हो। गोंसर डेनिम रिवोल्यूशन में डेनिम के रंग और विशेष प्रभाव तैयार करने के लिए लंबे समय से इस्तेमाल होने वाले कुछ रसायनों को धीरे-धीरे कम किया जा रहा है।

पोटैशियम परमैंगनेट और हाइपोक्लोराइट जैसे रसायनों की जगह कम नुकसानदेह विकल्पों को अपनाया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव पानी के इस्तेमाल में किया गया है। उत्पादन के विभिन्न चरणों में इस्तेमाल होने वाले पानी को उपचारित कर दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है।

कंपनी के अनुसार, तकनीकी सुधारों के जरिए एक जींस के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पानी को लगभग 75 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। ट्यूनीशिया जैसे ऐसे देश के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है, जहां लंबे समय तक सूखे की स्थिति चुनौती बनी रहती है।

एक अन्य निर्माता DEMCO ने जींस की धुलाई और रंग हल्का करने के लिए ओजोन गैस तथा बेहद कम मात्रा में ओजोनयुक्त पानी का इस्तेमाल शुरू किया है। कंपनी के अनुसार, इस तकनीक से पारंपरिक प्रक्रिया की तुलना में करीब 90 प्रतिशत पानी की बचत हो सकती है। कंपनी के संस्थापक और सीईओ जॉनी डी मेयर्समैन के मुताबिक चुनौती ऐसी तकनीक विकसित करने की है जो पारंपरिक डेनिम जैसा ही परिणाम दे, लेकिन पर्यावरण और कपड़ा पहनने वाले व्यक्ति के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा न करे।

इसी दिशा में UNEP का InTex कार्यक्रम भी काम कर रहा है। यूरोपीय संघ और डेनमार्क सरकार द्वारा वित्तपोषित यह पहल टेक्सटाइल उत्पादक देशों में छोटे और मध्यम उद्योगों को अधिक टिकाऊ और सर्कुलर उत्पादन अपनाने में मदद करती है। इसका उद्देश्य फैक्ट्रियों को अपने उत्पादन से जुड़े आंकड़े जुटाने और उनका विश्लेषण करने में सहायता देना है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि पर्यावरणीय प्रभाव सबसे अधिक कहां पड़ रहा है और किन बदलावों से वास्तविक सुधार हासिल किया जा सकता है।

डेनिम उद्योग में एक और बड़ा बदलाव डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट के रूप में आने वाला है। यूरोपीय संघ की नई व्यवस्था के तहत आने वाले वर्षों में कपड़ों से जुड़ी विस्तृत जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराई जाएगी। इससे उपभोक्ताओं को यह पता चल सकेगा कि कपड़े में इस्तेमाल फाइबर, कॉटन, बटन, रिवेट्स और धागा कहां से आए हैं, कपड़े को किस तरह धोया या तैयार किया गया और उसे भविष्य में रिसाइकिल किया जा सकता है या नहीं।

DEMCO की क्रिएटिव डायरेक्टर एलिसन डी मेयर्समैन के मुताबिक, डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट कंपनियों को कपड़े के निर्माण से जुड़ी लगभग पूरी जानकारी दर्ज करने के लिए प्रेरित कर रहा है। एक प्रदर्शन के दौरान उन्होंने QR कोड के जरिए यह दिखाया कि किसी कपड़े में इस्तेमाल कॉटन, बटन, रिवेट्स और धागे की उत्पत्ति का पता कैसे लगाया जा सकता है। टिकाऊ फैशन केवल फैक्ट्री में शुरू नहीं होता। इसका आधार डिजाइन तैयार होने के समय ही रखा जा सकता है।

कंपनियां अब रिसाइकल किए गए फाइबर के साथ-साथ बटन, धागे और जेब की लाइनिंग जैसी छोटी दिखने वाली चीजों के पर्यावरणीय प्रभाव पर भी विचार कर रही हैं। इन विकल्पों का सीधा असर कपड़े की उम्र, संसाधनों की खपत, इस्तेमाल होने वाले रसायनों की सुरक्षा और भविष्य में उसके रिसाइकिल होने की क्षमता पर पड़ सकता है।

एम्बर वैलेटा के मुताबिक, डेनिम उद्योग में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने की क्षमता मौजूद है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उपभोक्ताओं की पसंद बदलने से यह परिवर्तन संभव नहीं होगा। UNEP के InTex कार्यक्रम की प्रमुख क्लाउडिया जियाकोवेली के अनुसार, सरकारों को टिकाऊ उत्पादन के लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे।

ब्रांडों को डिजाइन के स्तर पर सस्टेनेबिलिटी और सर्कुलरिटी को शामिल करना होगा तथा निर्माताओं को स्वच्छ तकनीकों और बेहतर उत्पादन प्रक्रियाओं में निवेश जारी रखना होगा। अंततः डेनिम का भविष्य पूरी वैल्यू चेन में लिए जाने वाले छोटे-बड़े फैसलों पर निर्भर करेगा। उपभोक्ता भी टिकाऊ उत्पादों की मांग करके बदलाव में योगदान दे सकते हैं, लेकिन उद्योग और सरकारों की भूमिका निर्णायक रहेगी। एक साधारण जींस को केवल पहनकर फेंक देने वाला उत्पाद मानना पर्यावरणीय दृष्टि से सही नहीं है। उसके पीछे धरती से निकले संसाधन, पानी, ऊर्जा, रसायन, मशीनरी, परिवहन और सैकड़ों लोगों का श्रम शामिल है। इसलिए टिकाऊ जींस का सवाल केवल फैशन का नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और भविष्य की पर्यावरणीय सुरक्षा का सवाल भी है।

(फोटो-एआई)

 

You Might Also Like

Ladakh Gets Ready for India’s First High-Altitude Wildlife Safaris
India’s Homemakers turning to the Green Road to prosperity
महादेव की नगरी में स्वच्छता का नया अध्याय
भारत में स्कूली पर्यावरण शिक्षा को कैसे बदला जा सकता है?
African Nations Step Up Investment in the Circular Economy
TAGGED:Denim jeansFashion and EnvironmentFashion and sustainabilitySustainability
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp LinkedIn Email Copy Link Print
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe
LinkedInFollow
Popular News
AI Image
जल

स्पेन: समुद्री संरक्षण में बड़ा कदम, 23 नए समुद्री संरक्षित क्षेत्र प्रस्तावित

Environment Pulse
Environment Pulse
August 24, 2026
  ग्रीन एनर्जी, नेट जीरो और उसे प्राप्त करने के उपायों पर विमर्श
Green India 2047: जलवायु संकट से आत्मनिर्भरता की ओर
AI Reveals Massive Global Expansion of Ocean Algae Blooms
हिमालयी बाढ़ के पीछे पर्माफ्रॉस्ट अस्थिरता से जुड़ा जलवायु परिवर्तन: वैज्ञानिक अध्ययन

Categories

  • जल
  • जमीन
  • जंगल
  • जैव-विविधता
  • हवा
  • खनिज
  • ऊर्जा
  • ग्रीन जॉब
  • स्टोरी
  • इम्पैक्ट फीचर
  • वीडियो

About US

Environmentpulse.com is a bilingual (Hindi-English) news platform that presents high-quality news, views, and videos related to the environment.
Quick Link
  • ऊर्जा
  • खनिज
  • जैव-विविधता
  • जंगल
Top Categories
  • My Bookmark
  • Contact
  • Privacy Policy
Environment PulseEnvironment Pulse
© Pratham Publisher and Informatics Private Limited. All Rights Reserved. | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?