भारत के युवा क्षेत्रीय कलाकारों ने हिप-हॉप और रैप संगीत के माध्यम से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए अक्टूबर 2026 में ‘क्लाइमेट इमरजेंसी मिक्सटेप’ पहल की शुरुआत की है। विभिन्न संगठनों के सहयोग से तैयार इस एल्बम में छह स्वतंत्र कलाकारों और समूहों ने अपनी स्थानीय भाषाओं में पानी की किल्लत, प्रदूषण, बाढ़, वनों का विनाश और किसानों की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाया है। बेंगलुरु के रैपर काली, तमिलनाडु के ‘सोल्लिसाई सिस्टाह्स’, नवीन कुमार, अल्कामा और गमक सिन्हा जैसे कलाकारों ने अपने गीतों के जरिए कोंकण से लेकर हरियाणा और दिल्ली तक के पर्यावरणीय मुद्दों को मुखर किया है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम और बैंडकैंप पर उपलब्ध यह मिक्सटेप साबित करता है कि स्थानीय संगीत और कला के जरिए जलवायु संकट और उससे जुड़े सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को मुख्यधारा की बहस का हिस्सा बनाया जा सकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत के युवा क्षेत्रीय कलाकार अब हिप-हॉप और रैप संगीत के जरिए जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरणीय संकटों के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अक्टूबर 2026 में शुरू की गई पहल ‘क्लाइमेट इमरजेंसी मिक्सटेप’ के तहत छह स्वतंत्र संगीत समूहों और कलाकारों ने विभिन्न भाषाओं में जलवायु संकट पर आधारित रैप गीत तैयार किए हैं।
इसका उद्देश्य पर्यावरणीय समस्याओं को स्थानीय अनुभवों और आम लोगों की जिंदगी से जोड़ना है। यूथ की आवाज, क्रांतिनारी, असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स, फोकसोल और क्लाइमेट कल्चर कलेक्टिव के सहयोग से तैयार इस एल्बम में पानी की कमी, प्रदूषण, बाढ़, जंगलों और पहाड़ियों के विनाश तथा किसानों की समस्याओं को प्रमुखता दी गई है। बेंगलुरु के रैपर काली, जिनका असली नाम अक्षय है, ने अपने कन्नड़ गीत ‘नीर कोडु’ में पानी की किल्लत का अनुभव साझा किया है।
गीत में बताया गया है कि कैसे लोगों को पानी के लिए सामुदायिक नलों तक लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। बढ़ती गर्मी, बिजली कटौती और पानी की असमान उपलब्धता भी इसमें प्रमुख मुद्दे हैं। तमिलनाडु की महिला संगीतकारों के समूह ‘सोल्लिसाई सिस्टाह्स’ ने ‘वेप्पा मरथडियिला’ गीत के जरिए बाढ़ और आपदा प्रबंधन की चुनौतियों को उठाया है।
वहीं, नवीन कूमार का हरियाणवी प्रभाव वाला गीत ‘वन्न कट्टे’ अरावली पर्वतमाला में खनन और रियल एस्टेट विस्तार से हो रहे नुकसान पर सवाल खड़ा करता है। अल्कामा ने अपने हिंदी गीत ‘नष्ट एनवायरनमेंट’ में दिल्ली के वायु और जल प्रदूषण को आवाज दी है, जबकि पुणे के गमक सिन्हा का गीत ‘सॉयल’ मिट्टी को एक जीवंत पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए सूखे, तूफानों, रसायनों के इस्तेमाल और किसानों की पीड़ा को सामने लाता है।
इस पहल में संगीत को सामाजिक बदलाव का माध्यम बनाया गया है। कलाकारों के मुताबिक, जलवायु संकट केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि जातिगत असमानता, लैंगिक भेदभाव, आजीविका और विस्थापन से भी जुड़ा है। एल्बम को यूट्यूब, इंस्टाग्राम और बैंडकैंप जैसे मंचों पर उपलब्ध कराने का उद्देश्य इसकी पहुंच बढ़ाना है। यह पहल दर्शाती है कि स्थानीय भाषाओं और संगीत के जरिए पर्यावरण संरक्षण की चर्चा को व्यापक बनाया जा सकता है।
कोंकण में खनन से लेकर हरियाणा की गायब होती पहाड़ियों और बेंगलुरु के सूखते जलस्रोतों तक, युवा कलाकार जलवायु संकट के उन पहलुओं को सामने ला रहे हैं जो अक्सर मुख्यधारा की बहस में पीछे छूट जाते हैं।
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