वैज्ञानिकों ने ब्राजील में पिछले पाँच दशकों से मेंढकों की आबादी में हो रही भारी गिरावट और उनकी सामूहिक मौत के रहस्य को सुलझा लिया है। नए शोध के अनुसार, ‘काइट्रिड फंगस’ (Batrachochytrium dendrobatidis) इस संकट की मुख्य वजह है, जो उभयचरों की त्वचा को संक्रमित कर उनके शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगाड़ देता है और संवेदनशील प्रजातियों में मृत्यु दर 90% तक पहुंचा देता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : वैज्ञानिकों ने काइट्रिड फंगस को उभयचर प्रजातियों के विनाश से जोड़ा, जैव विविधता संरक्षण को लेकर बढ़ी चिंता साओ पाउलो। ब्राजील में पिछले पांच दशकों से मेंढकों की आबादी में हो रही भारी गिरावट के पीछे का रहस्य वैज्ञानिकों ने सुलझा लिया है। नए शोध में काइट्रिड फंगस (Batrachochytrium dendrobatidis) को इस संकट की प्रमुख वजह बताया गया है। यह फंगस उभयचरों की त्वचा को संक्रमित कर उनके शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे कई मामलों में उनकी मृत्यु हो जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 1970 के दशक से ब्राजील के जंगलों और आर्द्रभूमि क्षेत्रों में मेंढकों की संख्या में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही थी। कई प्रजातियां अपने पारंपरिक प्राकृतिक आवासों से गायब हो गईं।
लंबे समय तक शोधकर्ता इसके लिए जंगलों की कटाई, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और बीमारियों को संभावित कारण मानते रहे। नए अध्ययन में पुराने मैदानी सर्वेक्षणों, संग्रहालयों में सुरक्षित रखे गए नमूनों और आधुनिक आनुवंशिक विश्लेषण का सहारा लिया गया। इन साक्ष्यों से पता चला कि फंगस संवेदनशील प्रजातियों में तेजी से फैला और बड़े पैमाने पर मौतों का कारण बना। कुछ अत्यधिक संवेदनशील प्रजातियों में इससे मृत्यु दर 90 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ब्राजील की समृद्ध उभयचर जैव विविधता के लिहाज से यह नुकसान बेहद गंभीर है। अटलांटिक वन और अमेजन के आसपास पाए जाने वाले कई स्थानीय मेंढक या तो विलुप्त हो गए या गंभीर रूप से संकटग्रस्त हो गए। हालांकि, कुछ आबादी में हाल के वर्षों में आंशिक सुधार के संकेत भी मिले हैं। संरक्षण संगठनों ने उभयचर प्रजातियों के व्यापार की निगरानी, जैव सुरक्षा उपायों और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण को मजबूत करने की मांग की है। कुछ संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए नियंत्रित प्रजनन कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि फंगस के अलावा वनों की कटाई, कृषि रसायन और जलवायु परिवर्तन भी इन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।
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