
आने वाले समय में दुनिया को करना पड़ सकता है एक बड़े स्वास्थ्य संकट का सामना
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) भी मान रहा कि बढ़ती गर्मी से बढ़ रहे रोग
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि अब यह वैश्विक जनस्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। बढ़ता तापमान न केवल मौसम बदल रहा है, बल्कि संक्रामक बीमारियों के फैलने की गति और उनका दायरा भी बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में दुनिया एक बड़े स्वास्थ्य संकट का सामना कर सकती है।
हाल के वर्षों में डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया और लाइम रोग जैसी वेक्टर जनित बीमारियों के मामले बहुत बढ़ गए हैं। 2024 में डेंगू के 1.4 करोड़ से अधिक मामले सामने आए, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुने थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान और अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं इस वृद्धि के मुख्य कारण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्म मौसम मच्छरों, किलनियों (टिक्स), मक्खियों और अन्य रोग फैलाने वाले जीवों को अधिक समय तक जीवित रहने में मदद करता है। पहले जो मच्छर ठंड में मर जाते थे, वे अब ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं और नए इलाकों में फैल जाते हैं। इसी तरह, टिक्स भी अब ऊंची जगहों और ठंडे इलाकों में पहुंचने लगे हैं, जिससे लाइम रोग जैसी बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ गया है।
ऑस्ट्रेलिया की एडिलेड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पेंग बी के अनुसार, बढ़ता तापमान वायरस और बैक्टीरिया को तेजी से बढ़ने में मदद करता है। गर्म वातावरण में मच्छरों के अंदर वायरस जल्दी विकसित होता है, जिससे वे कम समय में ज्यादा लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। साथ ही, गर्म मौसम में लोग ज्यादा समय बाहर बिताते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) का भी मानना है कि जलवायु परिवर्तन उन प्राकृतिक चीजों को कमजोर कर रहा है, जो संक्रामक रोगों को नियंत्रित रखती थीं। बदलते मौसम का असर खेती, मछली पालन, पानी की उपलब्धता और लोगों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। इससे समाज की स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने की क्षमता कम हो रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि यह संकट सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा, पानी, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रहा है। हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि डेंगू के लगभग 18% मामलों का संबंध जलवायु परिवर्तन से है। अगर वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो 2050 तक डेंगू के मामलों में 50% से 75% तक की वृद्धि हो सकती है। कई देशों में डेंगू का प्रकोप पहले से ही ज्यादा बार देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खतरा सिर्फ मच्छरों तक सीमित नहीं है। आर्कटिक क्षेत्रों में पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से नए रोगजनकों के सक्रिय होने का डर बढ़ रहा है। वहीं, जंगलों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण वन्यजीवों और मनुष्यों का संपर्क बढ़ रहा है, जिससे ज़ूनोटिक बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर चूहों जैसी आबादी पर भी पड़ रहा है। बदलते पर्यावरण और आवासों के नष्ट होने से इनकी संख्या बढ़ रही है। चूहे हंटावायरस जैसे गंभीर रोग फैला सकते हैं, जिससे भविष्य में नए संक्रमणों का खतरा बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु संकट, जैव विविधता के नुकसान और संक्रामक रोगों के बीच गहरा संबंध है। स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र स्वाभाविक रूप से रोगों को फैलने से रोकते हैं किंतु जैव विविधता घटने से यह सुरक्षा कमजोर पड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाना काफी नहीं होगा।
इसके अलावा जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करना, वर्षा जल संरक्षण, जंगल बचाना, जैव विविधता की रक्षा करना, शहरों की योजना ठीक से बनाना और बीमारियों की निगरानी के लिए प्रभावी प्रणालियाँ विकसित करना आवश्यक है। साथ ही, लोगों में जागरूकता बढ़ाना और समुदाय-आधारित स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूत करना भी जरूरी है। वैज्ञानिकों का स्पष्ट संदेश है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान का स्वास्थ्य संकट है। अगर दुनिया के देश मिलकर अभी ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो बढ़ता तापमान ऐसी संक्रामक बीमारियों का सामना करने पर मजबूर कर सकता है, जिनके लिए हमारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं तैयार नहीं हैं।

