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Environment Pulse > ईको सिस्टम > खनिज > ओलों की मार के बीच हाई-डेंसिटी बागानों पर कश्मीर की नजर
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खनिज

ओलों की मार के बीच हाई-डेंसिटी बागानों पर कश्मीर की नजर

Environment Pulse
Last updated: August 28, 2026 8:44 pm
Environment Pulse
Published: August 28, 2026
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जम्मू-कश्मीर प्रशासन भी संशोधित हाई-डेंसिटी प्लांटेशन योजना और 50 प्रतिशत सब्सिडी के जरिए इसे बढ़ावा दे रहा है, हालांकि अभी कुल सेब क्षेत्र का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही इस तकनीक के तहत है। बाजार में ‘गाला’ जैसी किस्मों को अच्छी कीमत मिल रही है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल हाई-डेंसिटी तकनीक से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसके साथ एंटी-हेल नेट, बेहतर मौसम पूर्वानुमान और मजबूत फसल बीमा को अपनाना भी उतना ही जरूरी है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था इन दिनों बदलते मौसम की मार झेल रही है। दक्षिण कश्मीर के कई सेब उत्पादक इलाकों में पिछले दो महीनों के दौरान तेज ओलावृष्टि ने फलों को भारी नुकसान पहुंचाया और पेड़ों से सेब गिरा दिए।

फसल के महत्वपूर्ण चरण में बार-बार हो रही मौसम की घटनाओं ने पहले से बढ़ती खेती की लागत से जूझ रहे किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। लगातार हो रहे नुकसान के बीच किसान व्यापक फसल बीमा योजना लागू करने और एंटी-हेल नेट यानी ओलावृष्टि रोधी जाल के इस्तेमाल को बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

वहीं, कुछ बागवान और बागवानी विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते मौसम के बीच सेब की खेती के पारंपरिक तरीके में बदलाव भी समाधान का हिस्सा हो सकता है। कई किसान अब हाई-डेंसिटी यानी उच्च घनत्व वाले सेब बागानों की ओर देख रहे हैं। इस प्रणाली में क्लोनल रूटस्टॉक का इस्तेमाल किया जाता है और पारंपरिक बागानों की तुलना में एक हेक्टेयर में काफी अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं।

इससे उत्पादन क्षमता बढ़ती है और किसान सीमित जमीन से अधिक आमदनी हासिल कर सकते हैं। सेब उत्पादक के अनुसार, हाई-डेंसिटी बागानों के फल बेहतर कीमत हासिल कर सकते हैं और कुछ हद तक मौसम संबंधी जोखिमों से भी सुरक्षित रखे जा सकते हैं। उनका कहना है कि ओलावृष्टि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए बागानों में ओलारोधी जाल का व्यापक इस्तेमाल नुकसान कम करने में मदद कर सकता है।

हाई-डेंसिटी खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि इसमें पेड़ पारंपरिक बागानों की तुलना में जल्दी फल देना शुरू कर देते हैं। जहां पारंपरिक बागानों में उत्पादन शुरू होने में करीब छह से सात साल लग सकते हैं, वहीं हाई-डेंसिटी पौधे लगभग तीन साल में फल देना शुरू कर सकते हैं। इससे किसानों को अपने निवेश की भरपाई अपेक्षाकृत जल्दी करने का अवसर मिलता है।

इस प्रणाली में समान क्षेत्रफल से अधिक उत्पादन मिलने की संभावना भी रहती है। ऐसे समय में जब जमीन, श्रम और कृषि इनपुट की लागत लगातार बढ़ रही है, प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन किसानों के लिए आर्थिक रूप से आकर्षक विकल्प बन रहा है।

जम्मू-कश्मीर प्रशासन भी हाई-डेंसिटी खेती को बढ़ावा दे रहा है। संशोधित हाई-डेंसिटी प्लांटेशन योजना के तहत पांच वर्षों में 5,500 हेक्टेयर क्षेत्र को इस प्रणाली के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया है। किसानों को इसके लिए 50 प्रतिशत सब्सिडी भी दी जा रही है। होलिस्टिक एग्रीकल्चर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सरकार गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ नर्सरी और रूटस्टॉक सुविधाओं को मजबूत करने पर भी काम कर रही है।

इसका उद्देश्य किसानों को आधुनिक बागवानी के लिए बेहतर रोपण सामग्री उपलब्ध कराना है। हालांकि, कश्मीर में हाई-डेंसिटी खेती का विस्तार अभी शुरुआती दौर में है। जम्मू-कश्मीर फ्रूट एंड वेजिटेबल प्रोसेसिंग एंड इंटीग्रेटेड कोल्ड चेन एसोसिएशन के मुताबिक, फिलहाल क्षेत्र के कुल सेब उत्पादन क्षेत्र का करीब एक प्रतिशत ही हाई-डेंसिटी खेती के तहत है। हाई-डेंसिटी खेती अब भविष्य की दिशा दिखाई देती है। इस साल गाला किस्म के सेब को बेहतर कीमत मिल रही है और बाजार में कश्मीरी गाला की स्वीकार्यता भी लगातार बढ़ रही है। किसानों के अनुसार, गुणवत्ता और बाजार की स्थिति के आधार पर गाला सेब का फार्मगेट मूल्य फिलहाल करीब 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच रहा है।

किसानों के लिए हाई-डेंसिटी बागानों का आकर्षण केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं है। जल्दी फल देने वाले पेड़ कम समय में आय का स्रोत बन सकते हैं। इसके अलावा, प्रति हेक्टेयर अधिक उत्पादन छोटे और बंटे हुए खेतों से भी बेहतर आर्थिक रिटर्न हासिल करने में मदद कर सकता है। लेकिन विशेषज्ञों और किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब भी चरम मौसम की घटनाएं हैं।

हाई-डेंसिटी बागान मौसम के जोखिम को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। हालांकि आधुनिक बागानों की संरचना में सुरक्षात्मक उपायों को लागू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन ओलावृष्टि जैसी घटनाओं से बचाव के लिए एंटी-हेल नेट, समय पर मौसम चेतावनी और बेहतर आपदा प्रबंधन जरूरी रहेगा।

दक्षिण कश्मीर के किसान ने कहा कि मौसम पहले की तुलना में काफी अनिश्चित हो गया है और किसान अब केवल पारंपरिक बागानों पर निर्भर नहीं रह सकते। उनके मुताबिक, बेहतर बाजार मूल्य के साथ हाई-डेंसिटी बागानों को मौसम के झटकों से अपेक्षाकृत आसानी से सुरक्षित करने की संभावना भी इसे आकर्षक विकल्प बनाती है। कश्मीर की सेब अर्थव्यवस्था के लिए हाई-डेंसिटी खेती इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि यह उत्पादन, आय और भूमि के बेहतर इस्तेमाल के अवसर देती है।

लेकिन बदलती जलवायु के दौर में इसे किसानों की पूरी सुरक्षा का समाधान मानना जल्दबाजी होगी। आधुनिक बागवानी तकनीक के साथ ओलारोधी जाल, मौसम पूर्वानुमान, फसल बीमा और मजबूत बाजार एवं भंडारण व्यवस्था को साथ लेकर चलना ही कश्मीर के सेब किसानों को बढ़ते जलवायु जोखिमों से बचाने की दिशा में अधिक प्रभावी रणनीति साबित हो सकता है।

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