दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) पंजाब, हरियाणा और ISRO के साथ मिलकर पराली जलाने की निगरानी के लिए एक नया और सटीक प्रोटोकॉल तैयार कर रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले वायु प्रदूषण से निपटने की तैयारियों के बीच वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पराली जलाने की घटनाओं के आकलन की मौजूदा व्यवस्था को अधिक सटीक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
आयोग पंजाब और हरियाणा सरकारों के साथ-साथ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ बातचीत कर रहा है, ताकि खेतों में आग की निगरानी और उसके वास्तविक प्रभाव का बेहतर आकलन किया जा सके। CAQM के अध्यक्ष राजेश वर्मा के अनुसार, उपग्रहों से मिलने वाले फायर काउंट के आंकड़े उपयोगी हैं, लेकिन वे खेतों में होने वाली आग की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर सकते।
उन्होंने बताया कि बेहतर ‘ग्राउंड ट्रुथिंग’ प्रोटोकॉल विकसित करने के लिए ISRO और पंजाब के साथ चर्चा की जा रही है। हरियाणा के साथ भी निगरानी और आकलन की व्यवस्था में सुधार को लेकर बातचीत चल रही है। मौजूदा व्यवस्था में दिन के समय ध्रुवीय कक्षा वाले उपग्रहों से मिलने वाले सक्रिय आग के आंकड़ों का उपयोग पराली जलाने की घटनाओं का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।
हालांकि, हाल के वर्षों में खेतों में आग लगाने का समय शाम के बाद की ओर खिसकने से कुछ घटनाओं के उपग्रह निगरानी से छूट जाने की आशंका सामने आई है। विशेषज्ञ अध्ययनों में यह भी संकेत मिला है कि केवल आग की घटनाओं की संख्या के आधार पर पराली जलाने में कमी का आकलन पूरी तस्वीर नहीं देता। नई व्यवस्था में खेतों में जली हुई वास्तविक भूमि के क्षेत्रफल यानी ‘बर्न्ट एरिया’ को भी आकलन में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
इसके अलावा आग की तीव्रता को उच्च, मध्यम और निम्न श्रेणियों में बांटने की योजना है। इससे आग से होने वाले उत्सर्जन का अधिक सटीक अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। अधिकारियों के अनुसार प्रदूषण का स्तर केवल आग की संख्या पर निर्भर नहीं करता। खेत में मौजूद पराली की मात्रा, उसमें नमी की स्थिति और दहन की दक्षता जैसे कारक भी उत्सर्जन की मात्रा को प्रभावित करते हैं। ऐसे में एक ही फायर काउंट अलग-अलग परिस्थितियों में प्रदूषण की अलग मात्रा का संकेत दे सकता है।
CAQM ने ISRO से इस वर्ष एक बुनियादी प्रोटोकॉल विकसित करने का अनुरोध किया है, ताकि पराली जलाने की निगरानी केवल फायर काउंट तक सीमित न रहे। प्रस्तावित प्रणाली से वास्तविक जले हुए क्षेत्र और आग की तीव्रता की बेहतर जानकारी मिलने की उम्मीद है।
दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों के दौरान वायु प्रदूषण की समस्या को देखते हुए यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पंजाब और हरियाणा में धान की कटाई के बाद अक्टूबर और नवंबर के दौरान बड़े पैमाने पर पराली जलाने की घटनाएं सामने आती हैं।
इन घटनाओं से निकलने वाला धुआं अनुकूल मौसम परिस्थितियों में दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। CAQM ने 2026 में धान की पराली जलाने की घटनाओं को पूरी तरह समाप्त करने के उद्देश्य से राज्यों को व्यापक कार्ययोजनाएं लागू करने के निर्देश भी दिए हैं।
इनमें खेतों की मैपिंग, नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, कृषि मशीनरी की उपलब्धता बढ़ाना और रियल टाइम निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल शामिल है। शाम के समय निगरानी को विशेष महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि इसी अवधि में खेतों में आग लगाने की कई घटनाएं सामने आने की आशंका रहती है। अधिकारियों का कहना है कि निगरानी व्यवस्था में सुधार से जवाबदेही तय करने और नियमों के प्रभावी अनुपालन में मदद मिलेगी।
फसल कटाई का मौसम नजदीक आने के साथ राज्यों में निगरानी और प्रवर्तन की तैयारियां तेज होने की संभावना है। CAQM और संबंधित एजेंसियों की ओर से संशोधित प्रोटोकॉल को लेकर आने वाले सप्ताहों में और जानकारी सामने आने की उम्मीद है।
Also Read: मानसून और फ्लैश फ्लड अलर्ट: IMD ने 20 से अधिक राज्यों में भारी बारिश की चेतावनी जारी की

