केरल वन अनुसंधान संस्थान (KFRI) के अध्ययन के अनुसार, बांस में सामूहिक पुष्पन (ग्रेगेरियस मास्टिंग) और उसके बाद बड़े पैमाने पर पौधों के सूखने से पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर संकट आ सकता है। इससे घनी छतरी समाप्त हो जाती है, जिससे ‘सेना स्पेक्टेबिलिस’ जैसी आक्रामक विदेशी प्रजातियों के फैलने और जंगल की आग का खतरा बढ़ जाता है। साथ ही, चूहों की आबादी बढ़ने से जूनोटिक बीमारियों, हाथियों के लिए भोजन की कमी से मानव-हाथी संघर्ष और प्राकृतिक पुनर्जनन में बाधा जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: केरल वन अनुसंधान संस्थान (KFRI) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन ने बांस में होने वाले सामूहिक पुष्पन और उसके बाद बड़े पैमाने पर पौधों के सूखने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी दी है।
अध्ययन के अनुसार, बांस की एक साथ होने वाली पुष्पन प्रक्रिया और इसके बाद होने वाली मृत्यु से जंगलों में कई स्तरों पर पारिस्थितिक बदलाव शुरू हो सकते हैं, जिसका असर वनस्पति, वन्यजीव, जंगल की आग और मानव स्वास्थ्य तक पड़ सकता है।
सामान्य परिस्थितियों में घने बांस के जंगलों की छतरी इतनी सघन होती है कि सूर्य के प्रकाश का केवल 2 से 5 प्रतिशत हिस्सा ही वन भूमि तक पहुंच पाता है। लेकिन सामूहिक रूप से बांस के सूखने के बाद यह छतरी अचानक समाप्त हो जाती है और वन भूमि खुली हो जाती है।
इससे आक्रामक विदेशी प्रजातियों के तेजी से फैलने का रास्ता साफ हो जाता है। इनमें Senna spectabilis विशेष रूप से चिंताजनक है। शोध के अनुसार, यह प्रजाति फेनोलिक्स, फैटी एसिड और टरपेनॉयड जैसे जैव-रसायनों का उत्सर्जन करती है, जो स्थानीय पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इससे प्राकृतिक बीज भंडार कमजोर होता है और बांस के नए पौधों के पुनर्जनन में बाधा आती है।बांस के बड़े पैमाने पर सूखने के बाद जंगल की जमीन पर लाखों टन सूखे और खोखले बांस के तने जमा हो सकते हैं। यह अत्यधिक ज्वलनशील सामग्री जंगल की आग के खतरे को बढ़ाती है।
शुष्क मौसम में लगने वाली आग बांस की नई पौध को नष्ट करने के साथ मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों को भी प्रभावित कर सकती है। लगातार आग और पुनर्जनन में कमी के कारण वन क्षेत्र लंबे समय तक आक्रामक विदेशी वनस्पतियों के प्रभुत्व वाले क्षेत्र में बदल सकता है।बांस में सामूहिक बीज उत्पादन का प्रभाव वन्यजीवों पर भी पड़ता है।
बड़ी मात्रा में बीज उपलब्ध होने से Rattus और Melomys जैसी अनाज खाने वाली कृंतक प्रजातियों को अचानक प्रचुर मात्रा में भोजन मिल जाता है। इससे उनकी आबादी तेजी से बढ़ सकती है। पूर्वोत्तर भारत में ऐतिहासिक रूप से देखे गए ‘मौताम’ जैसे घटनाक्रमों में भी बांस के सामूहिक पुष्पन के बाद कृंतक आबादी में वृद्धि और फसलों को नुकसान का संबंध देखा गया है।
कृंतकों की संख्या बढ़ने से स्थानीय समुदायों में स्क्रब टाइफस और हंता वायरस जैसी जूनोटिक बीमारियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।बांस एशियाई हाथियों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आहार स्रोत है। इसके बड़े पैमाने पर सूखने से जंगलों में हाथियों के लिए भोजन की तत्काल कमी पैदा हो सकती है।
भोजन की तलाश में हाथी संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकलकर कृषि और मानव बस्तियों के नजदीक पहुंच सकते हैं, जिससे फसलों को नुकसान और मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ने की आशंका रहती है।वानस्पतिक दृष्टि से बांस का सामूहिक पुष्पन यानी ‘ग्रेगेरियस मास्टिंग’ एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटना है।
इसमें एक ही प्रजाति या वंश से जुड़े बांस के पौधे लंबे और प्रजाति-विशिष्ट अंतराल के बाद लगभग एक ही समय में फूलते हैं। कुछ बांस प्रजातियों में यह अंतराल 40 वर्ष से लेकर 120 वर्ष से भी अधिक हो सकता है।
इसके बाद कई प्रजातियां बीज पैदा करने के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सूख जाती हैं। इस प्रकार के जीवन चक्र को ‘मोनोकार्पिक लाइफसाइकिल’ कहा जाता है, जिसमें पौधा अपने पूरे जीवनकाल में एक बार फूलता है, बीज पैदा करता है और फिर उसकी मृत्यु हो जाती है।शोधकर्ताओं के अनुसार, बांस के सामूहिक पुष्पन और मृत्यु को केवल एक प्राकृतिक वनस्पति घटना के रूप में देखने के बजाय इसके व्यापक पारिस्थितिक प्रभावों को समझना जरूरी है।
आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण, जंगल की आग की रोकथाम, बांस के पुनर्जनन और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए समय रहते प्रबंधन रणनीतियां तैयार करना महत्वपूर्ण होगा।
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