फिजी में आयोजित UNFCCC की प्री-COP31 बैठकों में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों पर एक जैसी नीति यानी ‘वन साइज फिट्स ऑल’ लागू नहीं की जा सकती, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीतिक कदम उठाने की जरूरत है। उन्होंने ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों’ (CBDR-RC) के सिद्धांत का पालन करने की वकालत करते हुए अनुकूलन, उत्सर्जन में कमी और कार्यान्वयन को समान महत्व देने की बात कही। साथ ही, भारत ने उपग्रह आधारित पृथ्वी अवलोकन तकनीक और अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) के अपने अनुभवों को प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ साझा करने की पेशकश की है, ताकि आपदा प्रबंधन और तटीय सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि जलवायु कार्रवाई के लिए ‘वन साइज फिट्स ऑल’ यानी सभी देशों के लिए एक जैसी नीति प्रभावी नहीं हो सकती। इसके लिए स्थानीय अध्ययन और आकलन जरूरी हैं, ताकि उभरती चुनौतियों, उत्सर्जन में कमी, अनुकूलन उपायों और आवश्यक संसाधनों की पहचान की जा सके।
फिजी में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) की प्री-COP31 बैठकों के दौरान नेताओं के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए यादव ने कहा कि जलवायु कार्रवाई में अनुकूलन, उत्सर्जन में कमी और कार्यान्वयन के साधनों को समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जलवायु वार्ताओं में समानता तथा ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं’ (CBDR-RC) के सिद्धांतों का पूरी भावना और प्रतिबद्धता के साथ पालन किया जाना चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया, फिजी और तुवालु की संयुक्त मेजबानी में नादी (फिजी) और प्रशांत द्वीपीय देश तुवालु में आयोजित ये बैठकें नवंबर में तुर्किये के अंताल्या में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन की तैयारियों का हिस्सा हैं। भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और द्वीपों का उल्लेख करते हुए यादव ने कहा कि भारत प्रशांत द्वीपीय देशों के सामने मौजूद चुनौतियों को समझता है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट और नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च ने तटीय संवेदनशीलता के आकलन, समुद्री तटरेखा में बदलाव की निगरानी, समुद्री क्षेत्रीय योजना और एकीकृत तटीय प्रबंधन में विशेषज्ञता विकसित की है। उन्होंने बताया कि भारत उपग्रह आधारित पृथ्वी अवलोकन तकनीक के जरिए तटरेखा की निगरानी, बाढ़ के प्रभाव का आकलन, चक्रवातों और चरम मौसमी घटनाओं की पूर्व चेतावनी तथा जलवायु जोखिम का विश्लेषण करता है।
भारत ने इन तकनीकी अनुभवों और विशेषज्ञताओं को प्रशांत क्षेत्र के साझेदार देशों के साथ साझा करने की पेशकश भी की। यादव के अनुसार, भारत प्रशांत देशों के साथ स्वास्थ्य, नवीकरणीय ऊर्जा, आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे, पूर्व चेतावनी प्रणालियों, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग कर रहा है। तुवालु यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने तुवालु कोस्टल एडाप्टेशन प्रोजेक्ट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता से जमीनी स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की क्षमता मजबूत की जा सकती है।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP31 का आयोजन 9 से 20 नवंबर तक होगा। इसमें जलवायु अनुकूलन के लिए बड़े पैमाने पर वित्तपोषण, संवेदनशील देशों को जलवायु वित्त तक आसान पहुंच और देशों की जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने जैसे मुद्दे प्रमुख रहने की संभावना है। सम्मेलन की अध्यक्षता तुर्किये करेगा, जबकि वार्ताओं का संचालन ऑस्ट्रेलिया की जिम्मेदारी होगी।

