बढ़ते जलवायु परिवर्तन (तापमान, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़) के कारण दुनिया भर में कृषि और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब कृषि क्षेत्र में जलवायु अनुकूलन की रणनीतियों को केवल नारों या व्यापक योजनाओं तक सीमित रखने के बजाय ठोस एवं मापने योग्य परिणामों (Measurable Outcomes) पर केंद्रित करना होगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश, लंबे समय तक पड़ने वाला सूखा और बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अब कृषि क्षेत्र में जलवायु अनुकूलन की रणनीतियों को केवल लचीली खेती और बेहतर भविष्य जैसे व्यापक नारों तक सीमित रखने के बजाय ठोस एवं मापने योग्य परिणामों पर केंद्रित करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय से कृषि नीतियों में जलवायु के प्रभावों से निपटने के लिए खेती को मजबूत बनाने की बात कही जाती रही है, लेकिन अधिकांश योजनाओं में सफलता मापने के स्पष्ट मानक नहीं हैं।
इससे यह पता लगाना मुश्किल होता है कि कौन-सी योजनाएं वास्तव में किसानों और कृषि व्यवस्था को जलवायु संकट से निपटने में मदद कर रही हैं। जलवायु एवं कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब कृषि क्षेत्र में लचीलापन केवल एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य नहीं रह सकता। इसके लिए ऐसे संकेतक निर्धारित करने होंगे, जिनसे सूखे और बाढ़ जैसी परिस्थितियों में फसल उत्पादन की स्थिरता, मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता, किसानों की आय के विविध स्रोत और प्राकृतिक आपदाओं के बाद खेती को दोबारा सामान्य स्थिति में लाने में लगने वाले समय का आकलन किया जा सके।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सूखा सहन करने वाली फसल किस्मों का विकास, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और संरक्षण आधारित कृषि पद्धतियां जलवायु अनुकूलन के लिए महत्वपूर्ण बनी रहेंगी। हालांकि, इन उपायों की वास्तविक प्रभावशीलता जानने के लिए मानकीकृत मूल्यांकन प्रणाली जरूरी है। इसके लिए उपग्रह आधारित निगरानी, खेतों में लगाए जाने वाले सेंसर और किसानों की आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल बढ़ाने की सिफारिश की जा रही है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी कृषि तकनीक बदलती जलवायु परिस्थितियों में सबसे अधिक कारगर साबित हो रही है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है। मौसम की चरम घटनाओं के कारण फसलें खराब होने से ग्रामीण परिवारों की आजीविका प्रभावित हो रही है। कई क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में गिरावट खाद्य पदार्थों की कीमतों में अस्थिरता भी बढ़ा रही है। मापने योग्य जलवायु अनुकूलन रणनीतियों का उद्देश्य केवल फसल उत्पादन को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि किसानों की परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव करने की क्षमता बढ़ाना भी है।
इसके लिए समय पर मौसम और जलवायु संबंधी जानकारी, आसान एवं लचीली ऋण सुविधाएं तथा आय के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराना आवश्यक माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और शोध संगठन कृषि परियोजनाओं में निगरानी, मूल्यांकन और उनसे मिले अनुभवों के आधार पर सुधार की व्यवस्था मजबूत करने की वकालत कर रहे हैं। स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित होने से सरकारों को बजट और संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद मिलेगी।
वहीं, वित्तीय सहायता देने वाली संस्थाएं योजनाओं के वास्तविक प्रभाव का आकलन कर सकेंगी और किसानों को प्रमाणित लाभ देने वाली तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच कृषि को टिकाऊ बनाए रखने के लिए अनुकूलन की रणनीतियों में व्यापक बदलाव जरूरी है।
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों की आजीविका बचाने के लिए अब योजनाओं की सफलता का आकलन उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर करना होगा। अन्यथा, ऐसी परियोजनाओं पर संसाधन खर्च होने का खतरा बना रहेगा, जो कागजों पर प्रभावी दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तविक मौसम संबंधी संकट के सामने टिक नहीं पातीं।

