पूर्वोत्तर भारत के घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में कैमरा ट्रैप सर्वेक्षणों के माध्यम से दुर्लभ ग्रेटर हॉग बैजर (Arctonyx collaris) की मौजूदगी दर्ज की गई है। मोशन-एक्टिवेटेड कैमरों ने इस रहस्यमयी और निशाचर (रात में सक्रिय) स्तनपायी की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम वन और पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्लभ ग्रेटर हॉग बैजर (Arctonyx collaris) की मौजूदगी कैमरा ट्रैप सर्वेक्षणों के जरिए सामने आई है।
मोशन-एक्टिवेटेड कैमरों से इस रहस्यमयी स्तनपायी की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज इस प्रजाति के संरक्षण के लिए नई उम्मीद जगाती है और पूर्वोत्तर के जंगलों में इसकी वास्तविक आबादी को समझने में मदद कर सकती है।
शोधकर्ताओं ने पूर्वोत्तर के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में बड़ी संख्या में कैमरा ट्रैप लगाए। इन कैमरों ने रात के समय घने वनस्पति क्षेत्र से गुजरते, भोजन की तलाश करते और जंगल की नियमित पगडंडियों का इस्तेमाल करते ग्रेटर हॉग बैजर को रिकॉर्ड किया।
अलग-अलग स्थानों से मिली कई स्वतंत्र तस्वीरों और वीडियो ने उन क्षेत्रों में इस प्रजाति की मौजूदगी की पुष्टि की, जहां पहले इसके होने की पुष्टि नहीं हुई थी या इसे बेहद दुर्लभ माना जाता था।
ग्रेटर हॉग बैजर अपने सूअर जैसे थूथन, भारी शरीर और चेहरे पर सफेद रंग की विशिष्ट धारियों के लिए पहचाना जाता है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय रहने वाला और बेहद सतर्क जीव है। घने जंगलों में छिपकर रहने और रात में सक्रिय रहने की आदत के कारण इसके बारे में व्यापक स्तर पर आबादी का आकलन करना लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहा है।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ग्रेटर हॉग बैजर को ‘वल्नरेबल’ यानी संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। इसके सामने प्रमुख खतरों में प्राकृतिक आवास का नुकसान, जंगलों का विखंडन और आकस्मिक फंसने या शिकार का खतरा शामिल है।
जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने से इसके आवागमन और विभिन्न आबादी समूहों के बीच संपर्क पर भी असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, कैमरा ट्रैप से मिले प्रमाण इस प्रजाति की निगरानी के लिए गैर-हस्तक्षेपकारी तकनीकों की उपयोगिता को साबित करते हैं।
पारंपरिक सर्वेक्षणों में आसानी से नजर नहीं आने वाले इस जीव की गतिविधियों, आवास के इस्तेमाल और संभावित संख्या के बारे में कैमरा ट्रैप अधिक प्रभावी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि नए साक्ष्य संरक्षण की प्राथमिकताओं को तय करने में मदद करेंगे।
इससे उन जंगल क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जिन्हें ग्रेटर हॉग बैजर के लिए विशेष संरक्षण की जरूरत है। साथ ही, अवैध शिकार और आकस्मिक फंसने की घटनाओं पर निगरानी बढ़ाने तथा वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित रखने की रणनीति तैयार की जा सकती है।
आगे की निगरानी में अलग-अलग वन क्षेत्रों के बीच इस प्रजाति की आबादी के संपर्क और आवाजाही को समझने पर भी जोर दिया जाएगा। इसके लिए और अधिक कैमरा ट्रैप लगाए जाने तथा स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों से जोड़ने की योजना है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, पूर्वोत्तर के जंगलों में ग्रेटर हॉग बैजर की छिपी आबादी की पुष्टि इस बात का संकेत है कि क्षेत्र के दुर्गम और कम निगरानी वाले पारिस्थितिक तंत्रों में कई महत्वपूर्ण वन्यजीव अब भी मौजूद हो सकते हैं।
नियमित वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के जरिए इन आबादियों को सुरक्षित रखने के साथ इस दुर्लभ प्रजाति के संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।
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