भारत राज्य वन रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ट्री कवर में 2.27 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस अवधि के दौरान ट्री कवर 15,427.11 वर्ग किलोमीटर से घटकर 15,075.5 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी करीब 352 वर्ग किलोमीटर पेड़ों का आवरण कम हुआ है। हालांकि कुल कार्बन स्टॉक में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन तापमान वृद्धि, बदलता मानसून, भूमि उपयोग में बदलाव और बुनियादी ढांचे के विकास जैसी मानवीय व प्राकृतिक गतिविधियों के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर दबाव बढ़ रहा है, जिससे जल सुरक्षा और जैव विविधता प्रभावित हो रही है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारतीय हिमालयी क्षेत्र (आईएचआर) में पेड़ों के आवरण में चिंताजनक कमी दर्ज की गई है। भारत राज्य वन रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार, वर्ष 2021 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ट्री कवर में 2.27 प्रतिशत की गिरावट आई है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में यह जानकारी साझा की। आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ट्री कवर वर्ष 2021 में 15,427.11 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर 15,075.5 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस तरह दो वर्षों के दौरान करीब 352 वर्ग किलोमीटर ट्री कवर कम हुआ।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा समेत 13 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। हिमालयी क्षेत्र भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के जलवायु तंत्र, जल चक्र और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहां के वन जल स्रोतों के संरक्षण, मिट्टी को बांधे रखने, कार्बन अवशोषण और स्थानीय पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। हालांकि, ट्री कवर में कमी के बावजूद इस अवधि में वन क्षेत्र के कुल कार्बन स्टॉक में मामूली वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2021 में कार्बन स्टॉक 3,272.68 मिलियन टन था, जो 2023 में बढ़कर 3,273.10 मिलियन टन हो गया। यह वृद्धि बताती है कि क्षेत्र के जंगलों में कार्बन संचित करने की क्षमता फिलहाल बनी हुई है, लेकिन लगातार ट्री कवर घटने की प्रवृत्ति भविष्य में इस क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि वन स्वास्थ्य का आकलन केवल हरियाली या ग्रीननेस के आधार पर नहीं किया जा सकता। जंगलों की स्थिति कई पारिस्थितिक और जैव-भौतिक कारकों पर निर्भर करती है। इनमें मिट्टी की गहराई, मिट्टी का कटाव, वनस्पतियों की प्रकृति, जंगलों में आग, आक्रामक प्रजातियां, चराई और अवैध कटाई जैसे कारक शामिल हैं। वन सर्वेक्षण भारत (FSI) इन विभिन्न मानकों के आधार पर वन संसाधनों की निगरानी करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन भी हिमालयी क्षेत्र में वनस्पति पर बढ़ते दबाव का एक प्रमुख कारण है।
तापमान में वृद्धि, वर्षा के बदलते स्वरूप, लंबे समय तक सूखे और चरम मौसम की घटनाओं का असर हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है। इसके अलावा भूमि उपयोग में बदलाव, बुनियादी ढांचे का विस्तार, शिफ्टिंग कल्टीवेशन और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी ट्री कवर में कमी की वजह बन सकती हैं। हिमालय को अक्सर ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है।
यहां के वन नदियों के जल प्रवाह को नियंत्रित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने और बाढ़ तथा भूस्खलन के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में पेड़ों के आवरण में लगातार कमी से इन पारिस्थितिक सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने हिमालयी राज्यों में संरक्षण को प्राथमिकता देने, विकास परियोजनाओं में पारिस्थितिक संवेदनशीलता को ध्यान में रखने, स्थानीय और स्वदेशी प्रजातियों के बड़े पैमाने पर रोपण तथा जलवायु अनुकूलन उपायों को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। साथ ही, ट्री कवर में हो रहे बदलावों की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर समयबद्ध कार्रवाई को भी जरूरी बताया गया है।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ट्री कवर में आई यह गिरावट एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय संकेत है। हिमालय की पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखना केवल वन और वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, जैव विविधता, जलवायु स्थिरता और पर्वतीय समुदायों की आजीविका से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
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