भारतीय वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों के दौरान देश में 92 फीसदी दिनों तक चरम मौसमी घटनाओं का कहर देखने को मिला, जिससे जनजीवन, कृषि और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और ‘डाउन टू अर्थ’ की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान लू, बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और बेमौसम बारिश जैसी आपदाओं के चलते 3,220 लोगों की मौत हो गई और करीब 42.5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर फसलें बर्बाद हो गईं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : सीएसई और डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में जलवायु संकट की गंभीर तस्वीर नई दिल्ली। भारत में 2026 के पहले नौ महीनों के दौरान 92 फीसदी दिनों में किसी न किसी रूप में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। इन आपदाओं में 3,220 लोगों की जान चली गई, जबकि करीब 42.5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि पर खड़ी फसलें प्रभावित हुईं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ पत्रिका की संयुक्त रिपोर्ट में यह चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।
जनवरी से सितंबर 2026 के बीच जारी आंकड़ों के विश्लेषण में लू, बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और बेमौसम बारिश जैसी घटनाओं का व्यापक प्रभाव दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं ने देश के विभिन्न हिस्सों में जनजीवन, कृषि और बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया। उत्तर और मध्य भारत में भीषण गर्मी के कारण विशेषकर बुजुर्गों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों की मौतें हुईं। वहीं हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आई बाढ़ और पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में भारी बारिश से भूस्खलन तथा गांवों में जलभराव की स्थिति बनी। तटीय इलाकों में तेज हवाओं और समुद्री तूफानों ने मुश्किलें बढ़ाईं।
बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम के किसानों को धान, गेहूं और सब्जियों की फसलों में भारी नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक, तापमान में वृद्धि और बारिश के बदलते पैटर्न ने इन घटनाओं की गंभीरता बढ़ाई है। रिपोर्ट में आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने, समय रहते चेतावनी जारी करने, जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे के विकास और कृषि योजनाओं में जलवायु जोखिम को शामिल करने की जरूरत बताई गई है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और प्रभावी अनुकूलन उपायों के अभाव में चरम मौसमी घटनाओं का खतरा और बढ़ सकता है।
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