जलवायु परिवर्तन के कारण अब भारत में सिर्फ दिन की तपिश ही नहीं, बल्कि रातों की बढ़ती उमस भी सेहत के लिए गंभीर खतरा बन गई है। क्लाइमेट सेंट्रल की एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के मुताबिक, रात के बढ़ते तापमान की वजह से देश के करोड़ों लोग हर साल अपनी नींद के कई कीमती घंटे गंवा रहे हैं। इसका सबसे भयावह असर दक्षिण भारत में देखा जा रहा है, जहां गर्म और बेचैन करने वाली रातें अब एक स्थायी समस्या का रूप लेती जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रातों का यह बदलता मिजाज न सिर्फ लोगों की शारीरिक सेहत बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। देश में अब सिर्फ दिन की गर्मी नहीं, रातों की उमस भी सेहत के लिए खतरा बनती जा रही है। क्लाइमेट सेंट्रल की एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में सामने आया है कि बढ़ते रात्रिकालीन तापमान की वजह से भारत के लाखों लोग हर साल अपनी नींद के कई घंटे गंवा रहे हैं। इसका सबसे ज़्यादा असर दक्षिण भारत में देखा जा रहा है, जहां गर्म रातें अब एक स्थायी समस्या बनती दिख रही हैं।
दक्षिण भारत सबसे ज़्यादा प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार पुडुचेरी के निवासी साल भर में औसतन करीब 92 घंटे की नींद खो रहे हैं। आंध्र प्रदेश (88.6 घंटे) और केरल (88.3 घंटे) भी इस सूची में ऊपर हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक में हर व्यक्ति सिर्फ बदलते मौसम की वजह से करीब 8 घंटे अतिरिक्त नींद खो रहा है, जबकि तेलंगाना में भी हालात कम चिंताजनक नहीं हैं। चेन्नई सबसे ऊपर, दिल्ली सबसे नीचे बड़े शहरों की बात करें तो चेन्नई इस मामले में देश में पहले नंबर पर है — यहां एक औसत व्यक्ति सालाना करीब 93 घंटे कम सो पा रहा है। इसके बाद मुंबई (84 घंटे), कोलकाता (80 घंटे) और दिल्ली (66 घंटे) का नंबर आता है।
बंगलूरू में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नींद की कमी सबसे तेज़ी से बढ़ी है और हैदराबाद, अहमदाबाद व पुणे में भी यह असर साफ नज़र आने लगा है। जानकारों के मुताबिक बेतहाशा शहरीकरण और कंक्रीट के जंगल ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है — कंक्रीट और डामर दिन की गर्मी सोखकर रात में भी छोड़ते रहते हैं, जिससे तापमान नीचे नहीं आ पाता।
सेहत पर मंडराता खतरा
डॉक्टरों के मुताबिक एक स्वस्थ वयस्क को रोज़ाना 7 से 9 घंटे की अच्छी नींद चाहिए होती है। लेकिन जब रातें भी गर्म रहने लगती हैं, तो शरीर दिन की थकान से पूरी तरह उबर नहीं पाता और गहरी नींद बाधित होती है। लंबे समय तक ऐसा चलने पर हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक, डायबिटीज़, मोटापा, तनाव, डिप्रेशन, याददाश्त कमज़ोर होना और इम्यूनिटी घटने जैसी दिक्कतें सामने आ सकती हैं। नींद पूरी न होने का सीधा असर लोगों की काम करने और सही फैसले लेने की क्षमता पर भी पड़ता है।
पचास साल में दोगुना हुआ संकट
यह रिपोर्ट दुनिया भर के 1,338 शहरों के अध्ययन पर आधारित है। इसमें पाया गया कि 1970 के दशक की तुलना में जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली नींद की कमी अब लगभग दोगुनी हो चुकी है। साल 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में हर व्यक्ति ने गर्म रातों की वजह से औसतन 56 घंटे की नींद गंवाई, जिसमें से 10 प्रतिशत से ज़्यादा का सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से पाया गया।
वैज्ञानिकों की मानें तो जीवाश्म ईंधन के बढ़ते इस्तेमाल और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान को लगातार ऊपर धकेला है। अगर उत्सर्जन पर सख्त लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले सालों में गर्म रातों की यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है — और इसके साथ ही देश की नींद और सेहत दोनों पर संकट गहराता जाएगा।
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