कश्मीर के पुलवामा जिले की पंपोर तहसील में स्थित पारंपरिक केसर के खेतों पर कचरा डंपिंग स्थल और चूहों के आतंक के कारण गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा हो गया है। पाटलबाग गांव के पास बने इस डंपिंग स्थल के कारण चूहों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जो जमीन के भीतर केसर के कंदों को खाकर फसल को नष्ट कर रहे हैं। इस समस्या से पाटलबाग, चांदहरा, सोमबुरा और कंडीजल गांवों के लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र की खेती प्रभावित हुई है, जिससे किसानों की आय में भारी गिरावट आई है और कई किसानों ने खेती छोड़ दी है। इसके अलावा, प्लास्टिक कचरे, दूषित पानी के रिसाव और दुर्गंध से मिट्टी की गुणवत्ता व स्थानीय लोगों का जीवन भी प्रभावित हो रहा है। जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति ने डंपिंग स्थल को अवैध बताते हुए जांच शुरू की है, जबकि स्थानीय कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का रुख करने की योजना बनाई है। जीआई (GI) टैग प्राप्त कश्मीरी केसर की इस अमूल्य विरासत और किसानों की आजीविका को बचाने के लिए कचरे के उचित प्रबंधन की तत्काल मांग की जा रही है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : कश्मीर के पुलवामा जिले की पंपोर तहसील में पारंपरिक केसर की खेती पर पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है। पाटलबाग गांव के निकट वर्ष 2022 के आसपास स्थापित नगरपालिका कचरा डंपिंग स्थल से आसपास के केसर उत्पादक खेतों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आई हैं। किसानों का आरोप है कि कचरे के ढेर के कारण चूहों की संख्या बढ़ गई है, जो जमीन के भीतर मौजूद केसर के कंदों को खाकर फसल को नष्ट कर रहे हैं। करीब तीन हेक्टेयर में फैला यह डंपिंग स्थल राजमार्ग के किनारे और महत्वपूर्ण केसर खेतों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित है।
किसानों के अनुसार, पाटलबाग और आसपास के चांदहरा, सोमबुरा तथा कंडीजल गांवों में लगभग 120 हेक्टेयर क्षेत्र की खेती प्रभावित हुई है। पाटलबाग में करीब पांच में से एक केसर उत्पादक ने खेती छोड़ दी है या कम लाभ देने वाली दूसरी फसलों की ओर रुख किया है। पहले छोटे खेतों से सालाना कई लाख रुपये कमाने वाले किसानों की आय में भारी गिरावट आई है।
केसर के अधिकांश खेत करेवा पठारी भूमि पर स्थित हैं, जहां दूसरी फसलों की खेती करना कठिन है। ऐसे में किसानों के पास वैकल्पिक आजीविका के सीमित साधन हैं। चूहों से होने वाले नुकसान के अलावा, प्लास्टिक कचरे और दूषित पानी के रिसाव से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका है। दुर्गंध, मक्खियों, मच्छरों और आवारा कुत्तों के झुंड ने भी स्थानीय लोगों की परेशानी बढ़ा दी है।
खेतों में काम करने वाली महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर विशेष चिंता जताई जा रही है। जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति ने इस डंपिंग स्थल को अवैध बताते हुए पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के मामले की जांच शुरू की है। हालांकि, नगरपालिका अधिकारियों का कहना है कि भूमि कचरा निस्तारण के लिए आवंटित की गई थी और वैज्ञानिक तरीके से कचरे के उपचार के लिए मशीनरी स्थापित की जा रही है। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ठोस कचरा, प्लास्टिक कचरा और जैव-चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का रुख करने की योजना बनाई है। डंपिंग स्थल को हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन और अधिकारियों से अपील के बावजूद अब तक समाधान नहीं निकल पाया है।
भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त कश्मीरी केसर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और हजारों परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। इससे कृषि पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है। ऐसे में पारंपरिक केसर उत्पादक क्षेत्र के बीच कचरे का अनुचित निस्तारण खेती, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।
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