गुजरात के कच्छ जिले में भीषण सूखे और बारिश में भारी कमी (सामान्य वर्षा की केवल 29-30%) के कारण मालधारी पशुपालक समुदाय गंभीर संकट का सामना कर रहा है। प्राकृतिक चरागाहों में घास न उगने और सूखे चारे की कीमतें दोगुनी (₹6 से बढ़कर ₹12 प्रति किग्रा) होने से सरहद डेयरी में दैनिक दूध खरीद घटकर 4 लाख लीटर रह गई है। इस स्थिति में लखपत, अबडासा और नखत्राणा तहसीलों से पशुपालकों का मवेशियों के साथ पलायन शुरू हो गया है, जो 2018 के बाद सबसे बड़ा पलायन है। गुजरात सरकार ने रियायती दरों पर चारा वितरण और राहत केंद्र शुरू किए हैं, हालांकि स्थानीय संगठनों के अनुसार जिले के लगभग 21 लाख मवेशियों की तुलना में यह राहत अपर्याप्त है। विशेषज्ञों ने मवेशियों के संरक्षण के लिए पर्याप्त चारे, जल आपूर्ति और दीर्घकालिक राहत उपायों की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : गुजरात के कच्छ जिले में लंबे समय से बारिश नहीं होने और मानसूनी वर्षा में भारी कमी के कारण पशुपालक समुदाय गंभीर संकट का सामना कर रहा है।
चारे की किल्लत, दूध उत्पादन में गिरावट और पानी की कमी के चलते पशुओं पर निर्भर परिवार अपने मवेशियों के साथ दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं।
सितंबर 2026 के मध्य तक कच्छ में सामान्य मौसमी वर्षा का केवल 29 से 30 प्रतिशत पानी बरसा था। जिले के कुछ हिस्सों में वर्षा की कमी 60 से 70 प्रतिशत तक पहुंच गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का लगभग 19 प्रतिशत और छोटी सिंचाई योजनाओं में महज 13 प्रतिशत पानी शेष था। जिले में करीब 4.82 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र भी बारिश की कमी से प्रभावित हुआ, जबकि सीमित भूमि पर ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।
इस संकट का सबसे गंभीर असर मालधारी पशुपालकों पर पड़ा है। उनकी आजीविका मुख्य रूप से पशुपालन पर निर्भर है।
महत्वपूर्ण घास के मैदानों सहित प्राकृतिक चरागाहों में नई घास नहीं उगने से पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बेहद कम हो गई है। सूखे चारे की खुदरा कीमत लगभग छह रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 12 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है। ऐसे में दर्जनों पशुओं का पालन करना अनेक परिवारों के लिए मुश्किल हो गया है। कच्छ जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ यानी सरहद डेयरी के अनुसार, दूध की दैनिक खरीद घटकर लगभग चार लाख लीटर रह गई है, जबकि सामान्य तौर पर इसके पांच लाख लीटर तक पहुंचने की उम्मीद रहती है। लखपत, अबडासा और नखत्राणा तहसीलों के पशुपालकों ने अपने झुंडों के साथ पलायन शुरू कर दिया है।
स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 2018 के बाद इस तरह का बड़ा पलायन देखने को मिल रहा है। अब तक 700 से अधिक पशुओं को दूसरे स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। यदि हालात में सुधार नहीं हुआ, तो 2,500 से 3,000 पशुओं को स्थानांतरित करने की जरूरत पड़ सकती है। संकट से निपटने के लिए गुजरात सरकार ने चारा वितरण केंद्र खोले हैं और पशुपालकों को कार्ड जारी किए हैं। कुछ योजनाओं के तहत रियायती दर पर दो रुपये प्रति किलोग्राम तक की कीमत पर घास उपलब्ध कराई जा रही है।
सितंबर की शुरुआत तक कच्छ में 17 लाख किलोग्राम से अधिक घास वितरित की जा चुकी थी। इसके साथ ही चारे के अतिरिक्त भंडार और पानी की उपलब्धता पर भी निगरानी रखी जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, सूखा घोषित करने का निर्णय राष्ट्रीय सूखा प्रबंधन मैनुअल के प्रावधानों के तहत वैज्ञानिक आकलन के बाद लिया जाएगा। इस बीच कृषि और पशुपालन क्षेत्र के लिए राहत उपाय जारी हैं। हालांकि, स्थानीय समुदायों के प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि मौजूदा राहत जिले के अनुमानित 21 लाख पशुओं की जरूरतों के मुकाबले काफी कम है। उन्होंने चारे और पानी की आपूर्ति बढ़ाने की मांग की है।
कच्छ का मौजूदा संकट दर्शाता है कि मानसून की विफलता से पशुपालक अर्थव्यवस्था कितनी प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पशुओं के लिए पर्याप्त चारा, सुरक्षित जलापूर्ति और दीर्घकालिक राहत व्यवस्था सुनिश्चित करना क्षेत्र में पशुपालन आधारित आजीविका को बचाने के लिए बेहद जरूरी है।

