दिल्ली की जहरीली हवा ऐतिहासिक स्मारकों, विशेष रूप से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल ‘हुमायूं के मकबरे’ के बलुआ पत्थरों को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा रही है। आईआईटी रुड़की और आईआईटी कानपुर के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, प्रदूषित हवा (सल्फर डाइऑक्साइड और वाहनों के धुएं) के कारण पत्थरों की सतह पर जिप्सम की एक काली परत जम गई है, जो सतह के क्षरण और दरारों को बढ़ावा दे रही है। लाल किला और कुतुब मीनार जैसी अन्य ऐतिहासिक इमारतें भी इस प्रदूषण के प्रभाव का सामना कर रही हैं। शोधकर्ताओं ने इन अमूल्य धरोहरों की सुरक्षा के लिए नियमित वैज्ञानिक सफाई, उत्सर्जन नियंत्रण और कड़े संरक्षण उपायों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क । दिल्ली की जहरीली हवा अब केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय नहीं है, बल्कि शहर की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
आईआईटी रुड़की और आईआईटी कानपुर के संयुक्त अध्ययन में सामने आया है कि वायु प्रदूषण से बनने वाली काली परत हुमायूं के मकबरे जैसे ऐतिहासिक स्मारकों के बलुआ पत्थरों को कमजोर कर रही है और उनके क्षरण की प्रक्रिया को तेज कर रही है।
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हुमायूं का मकबरा 16वीं शताब्दी की मुगल वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण है। शोध के अनुसार, लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने के कारण मकबरे के बलुआ पत्थर की सतह पर काली परत जम गई है।
यह परत मुख्य रूप से जिप्सम से बनी होती है, जो सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), कैल्शियम युक्त धूल और नमी के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया से बनती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह काली परत केवल स्मारक की सुंदरता को प्रभावित नहीं करती, बल्कि इसमें वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक, निर्माण और सड़क की धूल, बायोमास जलाने से उत्पन्न कालिख तथा औद्योगिक प्रदूषण से आने वाले सूक्ष्म कण और धातु के कण भी जमा होते हैं।
समय के साथ इनका प्रभाव पत्थर की सतह को कमजोर कर सकता है और अपक्षय, सतही क्षरण, दरारों तथा दीर्घकालिक संरचनात्मक नुकसान का खतरा बढ़ा सकता है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि बारिश से सुरक्षित रहने वाली सतहों पर काली परत अपेक्षाकृत अधिक मोटी होती है।
इन हिस्सों में प्रदूषक लंबे समय तक जमा रहते हैं। इसके विपरीत, खुली सतहों पर बारिश कुछ प्रदूषकों को धो देती है, जिससे वहां काली परत अपेक्षाकृत पतली रहती है। हुमायूं का मकबरा दिल्ली की एकमात्र ऐसी ऐतिहासिक इमारत नहीं है जो प्रदूषण के प्रभाव का सामना कर रही है। लाल किला, कुतुब मीनार और सफदरजंग का मकबरा सहित कई ऐतिहासिक स्मारकों पर भी प्रदूषण से संबंधित काली परत और पत्थरों के क्षरण की समस्या देखी गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में लंबे समय तक बने रहने वाला वायु प्रदूषण, विशेषकर सर्दियों और मानसून के बाद की परिस्थितियों में, इन धरोहरों के लिए दीर्घकालिक खतरा पैदा कर सकता है। शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण के लिए काली परत की वैज्ञानिक तरीके से नियमित सफाई, प्रदूषण की लगातार निगरानी और संभावित सुरक्षात्मक कोटिंग्स के वैज्ञानिक मूल्यांकन जैसे उपाय सुझाए हैं।
साथ ही, वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने, स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने और कम प्रदूषण वाले ईंधनों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संबंधित एजेंसियों के सामने अब चुनौती यह है कि वैज्ञानिक अध्ययनों से सामने आए निष्कर्षों को संरक्षण की दीर्घकालिक रणनीतियों में शामिल किया जाए।
दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें केवल पर्यटन स्थलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे भारत की स्थापत्य विरासत और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में बढ़ते प्रदूषण से उनकी सुरक्षा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।
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