वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों में शहरों में खुले में कचरा जलाने की घटनाएं गर्मियों की तुलना में तीन गुना तक बढ़ जाती हैं। कमजोर हवाओं और टेम्परेचर इनवर्जन के कारण धुआं स्थानीय स्तर पर बना रहता है। टियर-2 शहरों में कचरे की मात्रा और टियर-3 शहरों में जलाने की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की गईं, जिसका मुख्य संबंध गरीब इलाकों में खराब कचरा प्रबंधन सेवाओं से है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: भारतीय शहरों में खुले में कचरा जलाने की समस्या सर्दियों में गंभीर रूप ले लेती है। गर्मियों की तुलना में सर्दियों के दौरान कचरा जलाने की घटनाएं, जलाए जाने वाले कचरे की मात्रा और उससे होने वाला उत्सर्जन औसतन तीन गुना तक बढ़ जाता है।
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया के जारी एक वर्किंग पेपर में यह निष्कर्ष सामने आया है। यह अध्ययन 2019 से 2026 के बीच देश के 11 प्रदूषित शहरों में किए गए फील्ड सर्वे पर आधारित है। अध्ययन में शहरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार सर्दियों में कमजोर हवाएं, वातावरण की स्थिरता और कई इलाकों में तापमान का उलटाव यानी टेम्परेचर इनवर्जन प्रदूषकों के फैलाव को सीमित करता है। इसके कारण खुले में जलाए गए कचरे का धुआं लंबे समय तक स्थानीय स्तर पर बना रह सकता है।
ठंड के मौसम में कुछ स्थानों पर लोग गर्मी पाने के लिए भी कचरा जलाते हैं। अध्ययन के मुताबिक 5 लाख से 50 लाख आबादी वाले टियर-2 शहरों में जलाए जाने वाले कचरे की मात्रा सबसे अधिक रही। यहां गर्मियों में प्रतिदिन करीब 21 टन कचरा जलाया जाता था, जो सर्दियों में बढ़कर लगभग 41 टन प्रतिदिन हो गया।
वहीं, टियर-3 शहरों में सर्दियों के दौरान कचरा जलाने की घटनाओं की दर सबसे अधिक दर्ज की गई। यहां प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन औसतन 49.6 घटनाएं सामने आईं। टियर-2 शहरों में यह आंकड़ा 46 और टियर-1 शहरों में 39.4 घटनाएं प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि खुले में कचरा जलाने से शहरों के कुल PM2.5 और PM10 उत्सर्जन में 1 प्रतिशत से भी कम योगदान होता है और यह वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत नहीं है।
हालांकि, इसकी गंभीरता इस वजह से बढ़ जाती है कि कचरा अक्सर घरों, सड़कों और कूड़ा जमा होने वाले स्थानों के बेहद करीब जलाया जाता है। इससे आसपास रहने वाले लोगों को जहरीले धुएं के सीधे और अल्पकालिक संपर्क का खतरा बढ़ जाता है। जलाए जाने वाले कचरे में कागज और प्लास्टिक प्रमुख सामग्री पाई गई।
अध्ययन में सामाजिक-आर्थिक असमानता और कचरा जलाने के बीच भी स्पष्ट संबंध सामने आया। अपेक्षाकृत गरीब इलाकों में उच्च आय वाले क्षेत्रों की तुलना में खुले में कचरा जलाने की घटनाएं काफी अधिक थीं। टियर-2 शहरों के गरीब इलाकों में सर्दियों के दौरान सबसे अधिक दर दर्ज की गई, जहां प्रति वर्ग किलोमीटर प्रतिदिन करीब 84 घटनाएं सामने आईं। शोधकर्ताओं ने इसके पीछे कचरा संग्रहण और नगरपालिका सेवाओं में असमानता को प्रमुख कारण बताया। यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में खुले में कचरा जलाने पर रोक लगाने के लिए कई कदमों की घोषणा की है। इसके तहत बार-बार कचरा फेंकने और जलाने वाले स्थानों की पहचान, आवश्यक हस्तक्षेप का आकलन, कचरा प्रबंधन कर्मचारियों का प्रशिक्षण, जन-जागरूकता अभियान और व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले पायलट समाधान विकसित करने की योजना है।
आयोग ने ‘ऑपरेशन क्लीन एयर’ के तहत खुले में कचरा जलाने के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस नीति पर जोर दिया है। मई में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने दिल्ली के अधिकारियों को सितंबर तक कचरा प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाने और सर्दियों में कचरा जलाने से रोकने के लिए प्रवर्तन दल तैनात करने की सलाह दी थी।
मंत्रालय ने ठंड से बचने के लिए कचरा जलाने की प्रवृत्ति रोकने के उद्देश्य से कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक हीटिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने की भी सिफारिश की थी। WRI इंडिया का अध्ययन सर्दियों में खुले में कचरा जलाने की मौसमी वृद्धि को रेखांकित करता है। रिपोर्ट के अनुसार मानसून के बाद जब देश के कई हिस्सों में वायु गुणवत्ता तेजी से खराब होने लगती है, तब विशेष रूप से मध्यम आकार के शहरों और कम आय वाले इलाकों में बेहतर कचरा प्रबंधन, प्रभावी संग्रहण व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर सख्त निगरानी की जरूरत और बढ़ जाती है।
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