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Environment Pulse > ओपिनियन > स्टोरी > हिमालयी पारिस्थितिकी की रक्षा विकास का विकल्प नहीं, मानवीय और भूवैज्ञानिक जरूरत
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स्टोरी

हिमालयी पारिस्थितिकी की रक्षा विकास का विकल्प नहीं, मानवीय और भूवैज्ञानिक जरूरत

Environment Pulse
Last updated: October 12, 2026 7:50 pm
Environment Pulse
Published: October 12, 2026
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हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम प्रबंधन की अनिवार्य भूवैज्ञानिक आवश्यकता बन गई है। अगस्त 2026 में नेपाल में ग्लेशियर फटने और भीषण बाढ़ (जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान गई) जैसी घटनाओं ने ‘तीसरे ध्रुव’ (हिंदूकुश हिमालय) के संरक्षण पर वैश्विक बहस तेज कर दी है। हिमालयी क्षेत्र में वैश्विक औसत से दोगुनी गति से बढ़ रहा तापमान ग्लेशियरों के पिघलने, GLOF (हिमनदीय झील फटने से बाढ़) और भूस्खलन के खतरे को बढ़ा रहा है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा को अब केवल पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव जीवन, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम कम करने की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है। हालिया नीतिगत लेखों, विशेषज्ञों की टिप्पणियों और सार्वजनिक बहसों में इस बात पर जोर दिया गया है कि विकास परियोजनाओं को हिमालय की पारिस्थितिक और भूवैज्ञानिक सीमाओं के अनुरूप तैयार करना जरूरी है।

अगस्त 2026 में नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी भीषण घटना और बाढ़ के बाद इस मुद्दे पर चर्चा तेज हुई। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इस आपदा में 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई और लाखों लोग प्रभावित हुए। इसके बाद विश्लेषकों और विभिन्न संस्थानों ने हिंदूकुश हिमालय को क्षेत्र की जीवनरेखा के रूप में सुरक्षित रखने की आवश्यकता रेखांकित की।

‘डाउन टू अर्थ’ में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया कि हिमालयी पारिस्थितिकी का संरक्षण पर्यावरण संबंधी विलासिता नहीं, बल्कि मानवीय अनिवार्यता है। इस क्षेत्र की स्थिरता दक्षिण एशिया में लगभग दो अरब लोगों की जल, खाद्य और आजीविका सुरक्षा से जुड़ी हुई है। दुनिया के ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में पहचाना जाने वाला हिमालय विश्व की सबसे युवा और भूवैज्ञानिक रूप से सक्रिय पर्वत प्रणालियों में शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, यहां तापमान में वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हो रही है।

इसके कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, पहाड़ी ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है और हिमनदीय झीलों के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ), भूस्खलन तथा मलबे के प्रवाह जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ और ‘साउथ एशिया मॉनिटर’ सहित विभिन्न माध्यमों में प्रकाशित नीतिगत टिप्पणियों में आगाह किया गया है कि पहाड़ों को असीमित सड़क निर्माण, बांधों, पर्यटन परियोजनाओं और बस्तियों के विस्तार के लिए खाली क्षेत्र मानना जोखिम बढ़ा सकता है। इसका असर केवल पर्वतीय समुदायों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी इलाकों में रहने वाली आबादी भी इससे प्रभावित होगी।

सिस्टमइक और इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव के अनुमानों के अनुसार, भारत के सकल आर्थिक उत्पादन का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाली सेवाओं पर निर्भर है। इसके मुकाबले हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रत्यक्ष आर्थिक योगदान लगभग 4.5 प्रतिशत बताया गया है। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि हिमालय का महत्व केवल पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता से भी जुड़ा है। इसी कारण विशेषज्ञ हिमालय संरक्षण को ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की रणनीति के साथ जोड़कर देख रहे हैं।

नीतिगत चर्चाओं में हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक सशक्त विकास प्राधिकरण बनाने, नदी घाटियों के स्तर पर संचयी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन करने, पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत बनाने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से विकास योजनाएं तैयार करने की जरूरत बताई गई है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए प्रभावित क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। भारत, नेपाल, चीन, भूटान और पाकिस्तान के बीच क्षेत्रीय सहयोग को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बंधा नहीं है।

एक देश में होने वाले पर्यावरणीय बदलावों और आपदाओं का प्रभाव पड़ोसी देशों के जल संसाधनों, कृषि और जनजीवन पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय का संरक्षण अंततः जल सुरक्षा सुनिश्चित करने, आपदाओं के जोखिम को कम करने और सबसे कमजोर समुदायों के हितों की रक्षा करने से जुड़ा है।

ऐसे में विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय, हिमालय की प्राकृतिक सीमाओं के अनुरूप दीर्घकालिक विकास मॉडल अपनाना समय की आवश्यकता है।

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