हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत से लगभग दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है (विशेषकर पश्चिमी हिमालय), जिसे ‘एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग’ कहा जाता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। हिमालय को अक्सर “तीसरा ध्रुव” या “एशिया का जल मीनार” कहा जाता है। लेकिन आज यही हिमालय दुनिया की औसत रफ्तार से कहीं तेज़ गर्म हो रहा है, और यह सिर्फ पहाड़ों की बात नहीं है — इसका असर सीधे लगभग दो अरब लोगों की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, जो दक्षिण और मध्य एशिया में पानी, खेती, बिजली और रोज़ी-रोटी के लिए इन्हीं पहाड़ों पर निर्भर हैं।
बर्फ और ग्लेशियरों का तेज़ी से पिघलना, बार-बार आती आपदाएं, और नदियों के बहाव में आता बदलाव — इन सबको मिलाकर यही कहा जा सकता है कि हिमालय एक धीमी लेकिन गहरी जलवायु आपदा की चपेट में है।
औसत से कहीं ज़्यादा तेज़ गर्मी आंकड़े बताते हैं कि 1980 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र हर दशक में करीब 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस की रफ्तार से गर्म हुआ है — जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है। 4,000 मीटर से ऊंचे इलाकों में तो यह रफ्तार 0.34 डिग्री प्रति दशक तक पहुंच जाती है।
इसे वैज्ञानिक भाषा में “एलिवेशन-डिपेंडेंट वार्मिंग” कहते हैं, यानी जितनी ज़्यादा ऊंचाई, उतना ही तेज़ असर। पश्चिमी हिमालय — लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का इलाका — बाकी हिस्सों के मुकाबले सबसे तेज़ी से गर्म हो रहा है।
अगर उत्सर्जन इसी तरह ऊंचा बना रहा, तो 2081-2100 तक यहां की सर्दियां बीसवीं सदी की शुरुआत के मुकाबले 7 डिग्री सेल्सियस से भी ज़्यादा गर्म हो सकती हैं। कम उत्सर्जन वाले हालात में भी बर्फ का नुकसान और गर्मी बढ़ना तय है। इसके पीछे एक चक्र काम करता है — बर्फ पिघलने से ज़मीन ज़्यादा खुली और गहरे रंग की हो जाती है, जो सूरज की गर्मी को परावर्तित करने के बजाय सोखने लगती है।
इससे पिघलना और तेज़ हो जाता है। साथ ही क्षेत्रीय प्रदूषण से आने वाला ब्लैक कार्बन और बर्फबारी की जगह बारिश होना, इस चक्र को और गहरा कर देते हैं। ग्लेशियरों का टूटता ढांचा हिमालय में 63,000 से ज़्यादा ग्लेशियर हैं, जो हज़ारों वर्ग किलोमीटर में फैले हुए विशाल मीठे पानी के भंडार हैं।
1990 से 2020 के बीच ही इन ग्लेशियरों ने अपने क्षेत्रफल का करीब 12% और बर्फ के भंडार का लगभग 9% खो दिया है, और यह गति अब और तेज़ हो रही है। अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो इस सदी के अंत तक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र अपने ग्लेशियर भंडार का 80% तक गंवा सकता है।
मौसमी बर्फ की चादर भी तेज़ी से सिमट रही है — मध्य और पूर्वी हिमालय में 1990 से 2020 के बीच लगभग 30% बर्फ कम हो चुकी है, और पश्चिमी हिस्सों में आने वाले सालों में और भी बड़ा नुकसान होने की आशंका है।
जैसे-जैसे ग्लेशियर पीछे हटते हैं, वे अपने पीछे नई-नई ग्लेशियर झीलें छोड़ जाते हैं। मध्य हिमालय के कुछ हिस्सों में 1970 के दशक के बाद से ऐसी झीलों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है।
ये झीलें अक्सर कमज़ोर मोरेन या बर्फ की दीवारों से घिरी होती हैं, और जब भूकंप, हिमस्खलन या तेज़ बारिश से यह दीवार टूटती है, तो पानी और मलबे का सैलाब नीचे की घाटियों में गांवों, सड़कों और बिजली परियोजनाओं को तबाह कर देता है। उत्तर भारत और सिक्किम में हाल की विनाशकारी बाढ़ें इसी की मिसाल हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2100 तक ऐसी आपदाओं का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है।
इसके अलावा, पर्माफ्रॉस्ट यानी हमेशा जमी रहने वाली ज़मीन भी पिघल रही है। यह ज़मीन एक तरह के प्राकृतिक सीमेंट का काम करती थी, जो पहाड़ों को स्थिर रखती थी। इसके कमज़ोर पड़ने से भूस्खलन और चट्टानें गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
पिछले कुछ दशकों में हिमस्खलन से हज़ारों लोगों की जान जा चुकी है, और 2010 के बाद इसकी रफ्तार और बढ़ी है।
लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा दांव पर
इस पूरे संकट का सबसे गहरा असर पड़ता है पानी पर। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के सालाना बहाव में बर्फ और ग्लेशियर पिघलने का योगदान 40% तक होता है। ये नदियां करोड़ों किसानों की सिंचाई, बड़े शहरों की पेयजल आपूर्ति और बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का आधार हैं। सिंधु बेसिन में तो मानसून से पहले के महीनों में खेती के लिए ज़रूरी पानी का बड़ा हिस्सा सिर्फ बर्फ पिघलने से ही आता है। फिलहाल तेज़ पिघलन से नदियों में पानी और बढ़ रहा है, जिससे बाढ़ और मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ गया है। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस सदी के मध्य तक ज़्यादातर नदी बेसिन “पीक वॉटर” यानी पिघलन से मिलने वाले पानी के अधिकतम स्तर तक पहुंच जाएंगे।
इसके बाद जैसे-जैसे बर्फ का भंडार घटेगा, सूखे मौसम में नदियों का बहाव कम होता जाएगा। यानी जो नदियां अभी ग्लेशियरों की वजह से साल भर स्थिर बहती हैं, वे धीरे-धीरे सिर्फ बारिश पर निर्भर और अनियमित हो जाएंगी — जिससे सूखा और बाढ़, दोनों की मार पहले से ज़्यादा तीखी होगी। गंगा के मैदानी इलाकों की खेती, जो दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से का पेट भरती है, इससे सीधे प्रभावित होगी। भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान के लिए जलविद्युत उत्पादन भी अनिश्चित होता जाएगा। हाई माउंटेन एशिया में भूजल भंडार भी हर साल करीब 24 अरब टन की दर से घट रहा है, और ग्लेशियरों का पिघलना अभी बस एक अस्थायी राहत दे रहा है।
अगर पानी के प्रबंधन और उत्सर्जन में बदलाव नहीं हुआ, तो 2060 के बाद यह गिरावट और तेज़ हो जाएगी। बढ़ती आपदाएं, बदलती ज़िंदगियां तेज़ मानसूनी बारिश, घटती बर्फ और कमज़ोर पड़ती पहाड़ी ढलानें मिलकर हिमालय को आपदाओं का केंद्र बना रही हैं। क्लाउडबर्स्ट, अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं पहले से ज़्यादा बार और ज़्यादा तीव्रता से हो रही हैं।
तंग घाटियों में बसे गांव सबसे ज़्यादा खतरे में हैं, जबकि नीचे के मैदानी इलाके बदलते बाढ़ पैटर्न और मिट्टी के जमाव से जूझ रहे हैं — और यह उन डेल्टा क्षेत्रों पर और बोझ डालता है जो पहले से समुद्र के बढ़ते स्तर की मार झेल रहे हैं।
जैव विविधता पर भी असर साफ दिख रहा है। पेड़-पौधों की रेखा ऊंचाई की ओर खिसक रही है, जिससे कई प्रजातियों के पास रहने की जगह ही नहीं बचेगी। पर्यटन और तीर्थयात्रा पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं, जो बर्फीले नज़ारों और स्थिर रास्तों पर टिकी हैं, अब पहले से ज़्यादा जोखिम भरी होती जा रही हैं।
सामाजिक स्तर पर, इससे पलायन बढ़ सकता है, पहाड़ी समुदायों में गरीबी गहरा सकती है, और साझा नदियों को लेकर देशों के बीच तनाव भी बढ़ सकता है।
आखिर यह “आपदा” ही क्यों
इसे साधारण जलवायु प्रभाव से आगे ले जाने वाली बात है इसका पैमाना, इसका इंसानी समय-सीमा में लगभग अपरिवर्तनीय होना, और इसका जोखिम इतने बड़े जनसमूह पर केंद्रित होना। लगभग दो अरब लोग — यानी दुनिया की करीब एक चौथाई आबादी — किसी न किसी रूप में हिमालय के पानी पर निर्भर है। बदलाव उतनी तेज़ी से हो रहे हैं, जितना पहले के मॉडलों ने भी नहीं सोचा था, और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में अनुकूलन के विकल्प बहुत सीमित हैं। एक बार जब ग्लेशियर और बर्फ के भंडार काफी हद तक खत्म हो जाएंगे, तो प्राकृतिक जलाशय की यह भूमिका पीढ़ियों तक वापस नहीं आ सकेगी। पश्चिमी हिमालय सबसे ज़्यादा संवेदनशील नज़र आ रहा है, लेकिन अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक पूरा हिमालयी क्षेत्र इसी दबाव में है।
जंगलों की कटाई, बिना सोचे-समझे बना ढांचागत विकास और ब्लैक कार्बन उत्सर्जन जैसी इंसानी गतिविधियां इस संकट को और बढ़ा रही हैं। इस संकट से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में तेज़ी से कमी लानी होगी, साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर मज़बूत कदम उठाने होंगे — बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली, टिकाऊ जल प्रबंधन, जलवायु के अनुकूल खेती, सोच-समझकर की गई जलविद्युत योजना, और बचे हुए ग्लेशियरों व पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा। हिमालय की यह गर्मी केवल एक पहाड़ी घटना नहीं है —
यह एक चेतावनी है कि एशिया के बड़े हिस्से की जल और खाद्य सुरक्षा की नींव धीरे-धीरे खिसक रही है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जो पहाड़ आज जीवनदायी नदियों का स्रोत हैं, वे कल बार-बार आने वाली आपदाओं और लंबे समय तक चलने वाली कमी का कारण बन सकते हैं — एक ऐसी जलवायु आपदा, जिसके असर पूरे महाद्वीप पर पड़ेंगे।
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