राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने गंगा के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) की परिभाषा में हाल ही में किए गए बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 10 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित संशोधन के तहत रिवर गंगा (रीजनरेशन, प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट) ऑर्डर्स, 2016 के पुराने प्रावधानों में बदलाव किया गया है, जिसके तहत बाढ़ क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से ‘निर्माण-मुक्त क्षेत्र’ बनाए रखने की व्यवस्था को हटा दिया गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। गंगा के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) की परिभाषा में हाल ही में किए गए बदलाव को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि नए संशोधन के जरिए गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे तथा बाढ़ क्षेत्र में लागू ‘निर्माण-मुक्त क्षेत्र’ की स्पष्ट व्यवस्था को हटा दिया गया है, जिससे पर्यावरणीय सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
NGT की प्रधान पीठ, जिसमें अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद शामिल हैं, ने पर्यावरणविद अमित कुमार और अधिवक्ता कात्यायनी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं की अर्जियों पर सुनवाई करते हुए केंद्र और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।
याचिकाओं में जल शक्ति मंत्रालय की ओर से किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। यह संशोधन रिवर गंगा (रीजनरेशन, प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट) अथॉरिटीज ऑर्डर, 2016 के तहत किया गया है और 10 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित हुआ।
संशोधित प्रावधान में गंगा और उसकी सहायक नदियों के तटों तथा बाढ़ क्षेत्रों को पहले की तरह स्पष्ट रूप से ‘निर्माण-मुक्त क्षेत्र’ बनाए रखने की बात नहीं कही गई है। पुराने प्रावधान में इन क्षेत्रों के लिए स्पष्ट तौर पर निर्माण-मुक्त व्यवस्था का उल्लेख था।
नए प्रावधान में कहा गया है कि इन क्षेत्रों को प्रदूषण के स्रोतों और दबाव को कम करने तथा भूजल के प्राकृतिक रिचार्ज की क्षमता को बनाए रखने के लिए आवश्यक उपायों के जरिए संरक्षित रखा जाएगा। संशोधन में बाढ़ क्षेत्र को बाढ़ की आवृत्ति के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है।
एक्टिव फ्लडप्लेन में वे इलाके शामिल होंगे, जहां पांच साल में एक बार आने वाली बाढ़ का पानी पहुंच सकता है। रेगुलेटरी जोन में पांच से 25 साल की पुनरावृत्ति वाली बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र आएंगे, जबकि वार्निंग जोन में 25 से 100 साल की अवधि में आने वाली बाढ़ से प्रभावित इलाकों को रखा गया है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव 2016 के आदेश के तहत उपलब्ध सुरक्षा को कमजोर करता है। उनके मुताबिक पहले बाढ़ क्षेत्र की पहचान मुख्य रूप से 100 साल में एक बार आने वाली बाढ़ के आधार पर की जाती थी और निर्माण पर अधिक सख्त नियंत्रण लागू था। अब एक्टिव फ्लडप्लेन की सीमा को पांच साल में आने वाली बाढ़ तक सीमित करने से संरक्षित क्षेत्र छोटा हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि निर्माण पर स्पष्ट और अनिवार्य रोक की जगह प्रदूषण कम करने तथा प्राकृतिक भूजल रिचार्ज बनाए रखने जैसे व्यापक प्रावधान लाने से कानूनी सुरक्षा कमजोर पड़ सकती है। उनका दावा है कि यह बदलाव NGT और अन्य अदालतों के पूर्व निर्देशों की भावना के विपरीत हो सकता है।
ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार, जल शक्ति मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) और अन्य संबंधित पक्षों को मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी। फिलहाल NGT ने संशोधन पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है।
गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बढ़ती निर्माण गतिविधियों को लेकर पहले से ही पर्यावरणीय चिंताएं बनी हुई हैं। पर्यावरण संगठनों को आशंका है कि संशोधित व्यवस्था के तहत ऐसे इलाके, जहां बाढ़ अपेक्षाकृत कम आती है, उचित मंजूरियों के अधीन विकास गतिविधियों के लिए उपलब्ध हो सकते हैं।
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