केंद्र सरकार (पर्यावरण मंत्रालय) ने 16 जनवरी 2026 को अधिसूचना (S.O. 238(E)) जारी कर कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास 0 से 1 किलोमीटर के दायरे में लगभग 243 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) घोषित किया है। राजसमंद, पाली और उदयपुर जिलों के 94 गांवों तक फैला यह क्षेत्र अरावली की जैव विविधता की रक्षा करेगा। इस क्षेत्र में व्यावसायिक खनन, नए क्रशर, ईंट-भट्ठे, पवनचक्की संयंत्र और 1 किमी के दायरे में नए होटल/रिसॉर्ट खोलने पर प्रतिबंध लगाया गया है, जबकि पारंपरिक कृषि और स्थानीय आजीविका को अनुमति दी गई है। इसके अनुपालन के लिए राजस्थान सरकार को दो साल में जोनल मास्टर प्लान तैयार करना होगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। राजस्थान के अरावली पर्वत क्षेत्र में जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार ने कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास 0 से 1 किलोमीटर तक का इको-सेंसिटिव जोन (ESZ) अधिसूचित किया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी अंतिम अधिसूचना 16 जनवरी 2026 को प्रकाशित की गई। अधिसूचना संख्या S.O. 238(E) के तहत करीब 243 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन में शामिल किया गया है।
अधिसूचना के अनुसार, अभयारण्य की सीमा से अधिकांश दिशाओं में एक किलोमीटर तक का क्षेत्र ESZ के दायरे में आएगा। वहीं उत्तरी हिस्से में इसकी सीमा शून्य किलोमीटर रखी गई है, क्योंकि यहां कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य की सीमा रावली टॉडगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से जुड़ती है। इको-सेंसिटिव जोन राजस्थान के राजसमंद, पाली और उदयपुर जिलों के कुछ हिस्सों में फैला है और इसमें कुल 94 गांव शामिल हैं।
करीब 610 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य उदयपुर से लगभग 80 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यह अरावली की पारिस्थितिक कड़ी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और बनास तथा लूणी नदी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र भी है।
नए ESZ में पर्यावरण पर गंभीर असर डालने वाली गतिविधियों पर रोक या कड़े नियमन का प्रावधान किया गया है। व्यावसायिक खनन, पत्थर की खदानें और क्रशर इकाइयों की अनुमति नहीं होगी। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की स्थापना या विस्तार को भी प्रतिबंधित किया गया है। इसके अलावा नए ईंट-भट्ठे लगाने और नए पवनचक्की संयंत्र स्थापित करने पर भी रोक रहेगी।
अभयारण्य की सीमा से एक किलोमीटर के भीतर नए व्यावसायिक होटल और रिसॉर्ट स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि, इको-टूरिज्म से जुड़ी छोटी और अस्थायी संरचनाओं के लिए निर्धारित नियमों के तहत अनुमति दी जा सकती है।
अधिसूचना में जंगल, कृषि भूमि, बागवानी क्षेत्रों और खुले स्थानों को बड़े पैमाने पर व्यावसायिक, आवासीय या औद्योगिक उपयोग में बदलने पर भी नियंत्रण रखा गया है। हालांकि स्थानीय समुदायों की पारंपरिक आजीविका प्रभावित न हो, इसका भी ध्यान रखा गया है। कृषि जैसे पारंपरिक कार्य और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए आवास निर्माण जैसी गतिविधियां निर्धारित नियमों के तहत जारी रह सकेंगी। कुंभलगढ़ अभयारण्य जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
यहां तेंदुआ, लकड़बग्घा, जंगल कैट, भारतीय पैंगोलिन, नीलगाय, जंगली सूअर और चिंकारा जैसी वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं। क्षेत्र में विभिन्न पक्षी प्रजातियों का भी आवास है, जिनमें पेंटेड फ्रैंकोलिन प्रमुख है।
सरकार के अनुसार, ESZ संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर एक तरह के ‘बफर’ या ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में काम करेगा। इसका उद्देश्य अभयारण्य पर बाहरी मानवीय गतिविधियों और विकास संबंधी दबाव को कम करना है, साथ ही स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के अनुकूल गतिविधियों को नियंत्रित तरीके से जारी रखना है।
अधिसूचना के तहत राजस्थान सरकार को स्थानीय लोगों और अन्य संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद दो वर्ष के भीतर जोनल मास्टर प्लान तैयार करना होगा। इसके क्रियान्वयन और नियमों के अनुपालन की निगरानी के लिए एक निगरानी समिति भी गठित की जाएगी।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि इको-सेंसिटिव जोन की घोषणा से जैव विविधता संरक्षण को मजबूती मिलेगी और स्थानीय समुदायों की आजीविका को टिकाऊ गतिविधियों के माध्यम से समर्थन दिया जा सकेगा। इनमें जैविक खेती और एग्रोफॉरेस्ट्री जैसी पहल शामिल हैं।
कुंभलगढ़ के आसपास ESZ की अधिसूचना अरावली के महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों को संरक्षित करने की दिशा में एक अहम कदम है। इसका उद्देश्य संरक्षण और स्थानीय आबादी की आवश्यकताओं के बीच संतुलन कायम करते हुए क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित करना है।
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