आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में स्थित जोंनागिरी सोने की खदान के संचालन के साथ भारत के सोना खनन क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव आया है। यह आजादी के बाद देश की पहली निजी क्षेत्र की व्यावसायिक स्तर की सोने की खदान और प्रसंस्करण परियोजना है, जिसे लगभग 405 करोड़ रुपये के निवेश से विकसित किया गया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में जोंनागिरी सोने की खदान के संचालन के साथ भारत के सोना खनन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। यह आजादी के बाद देश की पहली निजी क्षेत्र की व्यावसायिक स्तर की सोने की खदान और प्रसंस्करण परियोजना है। करीब 405 करोड़ रुपये के निवेश से विकसित यह परियोजना घरेलू स्तर पर सोने के उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ भारत की आयात निर्भरता कम करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है। जोंनागिरी परियोजना को जियोमाइसोर सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (GMSI) ने थ्रिवेणी समूह, डेक्कन गोल्ड माइंस और लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी के सहयोग से विकसित किया है।
यह परियोजना तुग्गली मंडल के जोंनागिरी, एर्रागुड़ी और पगडिरायी गांवों में करीब 598 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है। इसे फिलहाल भारत की एकमात्र संचालित निजी प्राथमिक सोने की खदान और देश की सबसे बड़ी निजी सोना खनन परियोजनाओं में शामिल किया जा रहा है। परियोजना में सोने के अयस्क के खनन से लेकर उसके प्रसंस्करण तक की व्यवस्था विकसित की गई है। खदान से वित्त वर्ष 2026-27 में करीब 400 किलोग्राम सोने के उत्पादन का अनुमान है।
आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़कर लगभग एक टन सालाना होने की उम्मीद है। क्षमता के आगे विस्तार के बाद यह आंकड़ा करीब दो टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकता है। जोंनागिरी क्षेत्र में प्रमाणित सोने के संसाधन करीब 13.1 टन आंके गए हैं। इसके अलावा खनिजयुक्त क्षेत्र में आगे भी अन्वेषण का काम जारी है, जिससे भविष्य में उपलब्ध संसाधनों और उत्पादन क्षमता में वृद्धि की संभावना है। खदान की अनुमानित परिचालन अवधि करीब 15 वर्ष है।
भारत दुनिया के प्रमुख सोना उपभोक्ताओं में शामिल है, लेकिन घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। ऐसे में देश के भीतर व्यावसायिक स्तर पर सोने का उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा की बचत में मदद मिल सकती है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने परियोजना को इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि कच्चे तेल के बाद सोना देश के सबसे बड़े आयात खर्च वाले क्षेत्रों में शामिल है।
जोंनागिरी परियोजना रायलसीमा क्षेत्र के लिए भी आर्थिक गतिविधियों और रोजगार का नया केंद्र बन सकती है। परियोजना से करीब 700 रोजगार पैदा होने का अनुमान है और इनमें लगभग 80 प्रतिशत कार्यबल स्थानीय समुदायों से लिया जाएगा। इससे क्षेत्र के युवाओं को खनन, प्रसंस्करण, मशीनरी संचालन और अन्य संबंधित गतिविधियों में रोजगार के अवसर मिलने की उम्मीद है। परियोजना से आंध्र प्रदेश सरकार को उत्पादित सोने के मूल्य पर चार प्रतिशत रॉयल्टी मिलेगी।
मौजूदा अनुमान के अनुसार, यदि सालाना 400 किलोग्राम सोने का उत्पादन होता है तो राज्य को करीब 57 करोड़ रुपये की वार्षिक रॉयल्टी प्राप्त हो सकती है। उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ राज्य का राजस्व भी बढ़ने की संभावना है। जोंनागिरी का संबंध केवल आधुनिक खनन गतिविधियों से नहीं बल्कि प्राचीन इतिहास से भी जोड़ा जाता है। इस क्षेत्र को पुराने समय में सुवर्णगिरि या स्वर्णगिरि के नाम से जाना जाता था।
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, मौर्य सम्राट अशोक के काल में यह क्षेत्र सोने के उत्पादन के केंद्रों में शामिल था। इसी ऐतिहासिक विरासत को देखते हुए जोंनागिरी गांव का नाम बदलकर स्वर्णगिरि किए जाने की घोषणा की गई है। जोंनागिरी परियोजना आंध्र प्रदेश सरकार की ‘स्वर्ण आंध्र 2047’ विकास दृष्टि के अनुरूप भी है। राज्य सरकार खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग को विस्तार देने और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर जोर दे रही है।
निजी क्षेत्र की इस परियोजना को राज्य में खनन आधारित औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। परियोजना में परीक्षण उत्पादन मई 2026 में शुरू हो चुका था। अब व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन बढ़ाने की तैयारी है। प्रसंस्करण संयंत्र के दूसरे चरण के विस्तार की दिशा में भी काम आगे बढ़ाया जा रहा है, जिससे आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता में वृद्धि हो सके। जोंनागिरी की सफलता भारत के निजी सोना खनन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकती है।
यदि परियोजना निर्धारित उत्पादन लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहती है और क्षेत्र में आगे के अन्वेषण से अतिरिक्त संसाधनों की पुष्टि होती है, तो देश में निजी निवेश के जरिए सोने की अन्य खनन परियोजनाओं के लिए भी रास्ता खुल सकता है। इससे भारत के घरेलू सोना उत्पादन को बढ़ावा मिलने के साथ आयात बिल को नियंत्रित करने और खनिज संसाधनों के अधिक प्रभावी उपयोग में मदद मिल सकती है।
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