सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की शैली वाली सेल्फी बनाने के वायरल ट्रेंड ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं। लाखों यूजर्स द्वारा कुछ ही सेकंड में रेट्रो तस्वीरें तैयार करने से डेटा सेंटरों पर ऊर्जा, पानी और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भारी दबाव पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के आकलनों के अनुसार, दशक के अंत तक AI डेटा सेंटरों का कुल जल पदचिह्न खरबों लीटर तक पहुंच सकता है, जबकि 2030 तक हर साल 25 लाख टन तक ई-कचरा पैदा होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस डिजिटल नॉस्टैल्जिया के पीछे छिपे पर्यावरणीय खर्च से निपटने के लिए ऊर्जा-कुशल मॉडल, बेहतर कूलिंग तकनीक, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और हार्डवेयर रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना बेहद आवश्यक है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की शैली में सेल्फी को बदलने वाला वायरल ट्रेंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर नई बहस का कारण बन गया है। इंस्टाग्राम समेत विभिन्न प्लेटफॉर्म पर लाखों यूजर्स बड़े बालों, एसिड-वॉश डेनिम और फिल्म-ग्रेन इफेक्ट वाली रेट्रो तस्वीरें कुछ ही सेकंड में तैयार कर रहे हैं।
हालांकि, इस डिजिटल नॉस्टैल्जिया के पीछे उन डेटा सेंटरों के बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, पानी की खपत और इलेक्ट्रॉनिक कचरे को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जो इन AI सेवाओं को संचालित करते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, एक AI तस्वीर तैयार करने में लगने वाली ऊर्जा अपेक्षाकृत कम हो सकती है, लेकिन जब लाखों लोग एक साथ तस्वीरें बनाते और बार-बार उनमें बदलाव करते हैं, तो इसका सामूहिक प्रभाव काफी बढ़ जाता है। AI सेवाओं की बढ़ती मांग के साथ डेटा सेंटरों की बिजली खपत भी तेजी से बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान है।
AI डेटा सेंटरों को लगातार ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और ऊर्जा की जरूरत होती है। इसके अलावा AI से जुड़ी बिजली उत्पादन और हार्डवेयर निर्माण की प्रक्रिया भी अप्रत्यक्ष रूप से जल संसाधनों पर दबाव डालती है। विभिन्न अध्ययनों और संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय से जुड़े आकलनों के अनुसार, दशक के अंत तक AI डेटा सेंटरों से जुड़ा कुल जल पदचिह्न खरबों लीटर प्रतिवर्ष तक पहुंच सकता है।
एक अकेली AI तस्वीर तैयार करने में पानी की खपत कुछ दर्जन मिलीलीटर के स्तर पर हो सकती है, लेकिन वैश्विक स्तर पर अरबों इमेज जनरेशन होने पर यह मात्रा काफी बड़ी हो जाती है। जल-संकट वाले क्षेत्रों में नए डेटा सेंटरों की स्थापना को लेकर स्थानीय समुदायों में घरेलू और कृषि जरूरतों के साथ संभावित प्रतिस्पर्धा की चिंता भी बढ़ रही है।
AI के पर्यावरणीय प्रभाव का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू इलेक्ट्रॉनिक कचरा है। जनरेटिव AI के तेजी से विस्तार के साथ GPU, सर्वर, मेमोरी मॉड्यूल और अन्य कंप्यूटिंग उपकरणों को तेजी से अपग्रेड करने की जरूरत बढ़ रही है। अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि आक्रामक विस्तार की स्थिति में जनरेटिव AI वर्ष 2030 तक हर साल 25 लाख टन तक इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा कर सकता है।
पुराने हार्डवेयर के निपटान और सीमित रीसाइक्लिंग क्षमता वाले क्षेत्रों में इसके पहुंचने से पर्यावरणीय जोखिम और बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यावरणीय चिंता को केवल किसी एक सोशल मीडिया ट्रेंड या व्यक्तिगत यूजर की AI तस्वीर से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। असली चुनौती AI बुनियादी ढांचे के व्यापक और तेज विस्तार की है।
डेटा सेंटरों की बिजली मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें AI वर्कलोड प्रमुख कारणों में शामिल है। ऐसे में उद्योग और नीति-निर्माताओं पर AI के ऊर्जा और पानी के इस्तेमाल में अधिक पारदर्शिता लाने, ऊर्जा-कुशल मॉडल विकसित करने, बेहतर कूलिंग तकनीक अपनाने, नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाने और हार्डवेयर के पुनर्चक्रण को मजबूत करने का दबाव बढ़ रहा है।
1980 के दशक की तस्वीरों का वायरल ट्रेंड भले ही मनोरंजन और नॉस्टैल्जिया से जुड़ा हो, लेकिन इसने एक बड़े सवाल को आम लोगों की चर्चा का हिस्सा बना दिया है—तेजी से विकसित हो रही AI तकनीक के लाभ और उसके वास्तविक पर्यावरणीय खर्च के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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