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Environment Pulse > ईको सिस्टम > हवा > भारी उद्योगों के लिए रियल-टाइम उत्सर्जन निगरानी अनिवार्य, हाईकोर्ट ने कसा शिकंजा
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कचरा-प्रबंधनहवा

भारी उद्योगों के लिए रियल-टाइम उत्सर्जन निगरानी अनिवार्य, हाईकोर्ट ने कसा शिकंजा

Environment Pulse
Last updated: September 23, 2026 9:24 pm
Environment Pulse
Published: September 23, 2026
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झारखंड समेत कई राज्यों के उच्च न्यायालयों ने औद्योगिक प्रदूषण पर शिकंजा कसते हुए स्टील, सीमेंट, थर्मल पावर और रासायनिक जैसी प्रमुख विनिर्माण इकाइयों के लिए ‘रियल-टाइम रिमोट एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम’ लगाना अनिवार्य कर दिया है। इसके तहत प्रदूषण का डेटा सीधे प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को भेजा जाएगा। अदालतों का यह कदम बिगड़ती वायु गुणवत्ता और अचानक होने वाले प्रदूषण की सही पहचान के लिए उठाया गया है। नियमों का पालन न करने वाली इकाइयों पर जुर्माना और परिचालन संबंधी प्रतिबंध लगाए जाएंगे, जबकि पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाने के भी निर्देश दिए गए हैं। पर्यावरण संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है, वहीं उद्योगों ने तकनीकी मानकों और लागत को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग की है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क: झारखंड समेत कई राज्यों के हाईकोर्ट ने औद्योगिक प्रदूषण पर सख्ती बढ़ाते हुए प्रमुख विनिर्माण इकाइयों को रियल-टाइम रिमोट एमिशन मॉनिटरिंग सिस्टम लगाने और संचालित करने के निर्देश दिए हैं।

इन निर्देशों के दायरे में स्टील प्लांट, सीमेंट कारखाने, थर्मल पावर स्टेशन और रासायनिक इकाइयां शामिल हैं। इन प्रणालियों के जरिए उत्सर्जन से जुड़ा डेटा लगातार प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों तक भेजा जाएगा, जिससे पार्टिकुलेट मैटर, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों की निगरानी संभव होगी।

अदालतों का हस्तक्षेप औद्योगिक क्षेत्रों में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच आया है। अदालतों ने माना कि केवल समय-समय पर होने वाले निरीक्षण और उद्योगों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े प्रदूषण में अचानक होने वाले बदलावों की पहचान के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।

उद्योगों को निगरानी ढांचे को अपग्रेड करने के लिए निर्धारित समयसीमा दी गई है। अनुपालन में विफल रहने वाली इकाइयों पर जुर्माना, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति या परिचालन संबंधी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को उपलब्ध डेटा के बेहतर एकीकरण और जहां संभव हो, सार्वजनिक डैशबोर्ड के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए हैं। पर्यावरण संगठनों ने फैसलों का स्वागत किया है, जबकि उद्योग प्रतिनिधियों ने तकनीकी मानकों, डेटा सुरक्षा और छोटे उद्योगों के लिए संक्रमण लागत को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग की है।

आने वाले महीनों में अनुपालन की समीक्षा और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता का आकलन किए जाने की उम्मीद है।

Also Read: पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण पर बढ़ी निगरानी, अरावली और पूर्वोत्तर में उठे सवाल

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