By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
Environment PulseEnvironment PulseEnvironment Pulse
Notification Show More
Font ResizerAa
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Reading: 1.5 डिग्री से अस्थायी रूप से अधिक तापमान भी ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों को पहुंचाएगा स्थायी नुकसान, वैज्ञानिकों की चेतावनी
Share
Font ResizerAa
Environment PulseEnvironment Pulse
  • ईको सिस्टम
  • कचरा-प्रबंधन
  • फ्यूचर ग्रीन
  • ओपिनियन
  • मल्टीमीडिया
Search
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Have an existing account? Sign In
Follow US
Environment Pulse > ईको सिस्टम > 1.5 डिग्री से अस्थायी रूप से अधिक तापमान भी ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों को पहुंचाएगा स्थायी नुकसान, वैज्ञानिकों की चेतावनी
AI Image
ईको सिस्टम

1.5 डिग्री से अस्थायी रूप से अधिक तापमान भी ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों को पहुंचाएगा स्थायी नुकसान, वैज्ञानिकों की चेतावनी

Environment Pulse
Last updated: November 2, 2026 8:25 pm
Environment Pulse
Published: November 2, 2026
Share
AI Image
SHARE

इंटरनेशनल क्रायोस्फीयर क्लाइमेट इनिशिएटिव (ICCI) द्वारा UNEP के समन्वय से 2 नवंबर 2026 को जारी ‘ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर’ और ‘स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026’ रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा का अस्थायी रूप से पार होना भी पृथ्वी के बर्फीले क्षेत्रों (क्रायोस्फीयर) को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। तापमान बाद में घटने पर भी ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका और पर्वतीय ग्लेशियरों के नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी, क्योंकि बर्फ 1990 के दशक की तुलना में छह गुना तेजी से पिघल रही है। इस पिघलाव से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, जल सुरक्षा खतरे में पड़ेगी और पर्माफ्रॉस्ट पिघलने से कार्बन उत्सर्जन और बढ़ेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों में भारी कटौती और कार्बन हटाने की तकनीकों से तापमान वृद्धि के स्तर और अवधि को न्यूनतम रखकर ही इस गंभीर संकट को टाला जा सकता है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की सीमा अस्थायी रूप से पार होना भी पृथ्वी के बर्फीले क्षेत्रों के लिए स्थायी नुकसान का कारण बन सकता है।

संयुक्त राष्ट्र समर्थित वैज्ञानिकों की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तापमान बाद में घटकर 1.5 डिग्री या उससे नीचे आ भी जाए, तब भी ध्रुवीय बर्फ की चादरों, पर्वतीय ग्लेशियरों और अन्य जमे हुए पारिस्थितिक तंत्रों को हुए कई नुकसान की भरपाई संभव नहीं होगी।

2 नवंबर 2026 को जारी ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर: अवर्टिंग ग्लोबल मेल्टडाउन नामक रिपोर्ट इंटरनेशनल क्रायोस्फीयर क्लाइमेट इनिशिएटिव (ICCI) ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के समन्वय से तैयार की है।

इसमें 80 से अधिक ध्रुवीय और पर्वतीय क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के शोध एवं विशेषज्ञता को शामिल किया गया है। इसके साथ ही स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026: द कॉस्ट ऑफ ओवरशूट रिपोर्ट भी जारी की गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, वैश्विक तापमान का 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाना अब कुछ अवधि के लिए लगभग अपरिहार्य माना जा रहा है।

इससे पृथ्वी के क्रायोस्फीयर यानी बर्फ और जमे हुए जल वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है। इसमें ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की चादरें, पर्वतीय ग्लेशियर, समुद्री बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट यानी स्थायी रूप से जमी जमीन और ध्रुवीय महासागर शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ध्रुवीय बर्फ की चादरें 1990 के दशक की तुलना में लगभग छह गुना तेजी से पिघल रही हैं। इससे समुद्र के जलस्तर में होने वाली दीर्घकालिक वृद्धि और ग्लेशियरों का नुकसान आने वाली कई शताब्दियों या हजारों वर्षों तक बना रह सकता है, भले ही वैश्विक तापमान बाद में कम कर लिया जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि ध्रुवीय बर्फ की चादरों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए वैश्विक तापमान वृद्धि की सीमा 1 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे होनी चाहिए। इसके विपरीत, औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में दुनिया पहले ही लगभग 1.3 से 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि कुछ प्राकृतिक प्रणालियों में ऐसे निर्णायक बिंदु (टिपिंग पॉइंट) मौजूद हैं, जिन्हें पार करने के बाद बदलाव को वापस पहले जैसी स्थिति में लाना बेहद मुश्किल या असंभव हो सकता है।

कई बर्फीले पारिस्थितिक तंत्रों की पुनर्बहाली की प्रक्रिया भी बेहद धीमी होती है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बर्फ पिघलने की तेज रफ्तार से समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे तटीय क्षेत्रों और वहां रहने वाली आबादी पर खतरा बढ़ सकता है। पर्वतीय ग्लेशियरों के सिकुड़ने से उन क्षेत्रों में जल सुरक्षा प्रभावित होगी, जहां लाखों लोग पीने के पानी, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए ग्लेशियरों पर निर्भर हैं। इसके अलावा पर्वतीय क्षेत्रों में हिमस्खलन, भूस्खलन और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।

पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से उसमें जमा कार्बन भी वातावरण में उत्सर्जित हो सकता है, जिससे जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया और तेज होने की आशंका है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान वृद्धि की अवधि और स्तर को अभी भी सीमित किया जा सकता है। इसके लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तत्काल और गहरी कटौती के साथ-साथ वातावरण से बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की आवश्यकता होगी।

यदि वैश्विक तापमान को जल्द से जल्द 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाया जाता है, तो आगे होने वाले नुकसान की रफ्तार कम की जा सकती है। समुद्री बर्फ और कुछ ग्लेशियरों के हिस्सों में दशकों से लेकर शताब्दियों के दौरान आंशिक सुधार की संभावना भी बनी रह सकती है। तुर्किये में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन से कुछ दिन पहले जारी इन रिपोर्टों ने वैश्विक जलवायु नीति के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती रखी है।

वैज्ञानिकों का स्पष्ट संदेश है कि केवल तापमान को भविष्य में कम करने का लक्ष्य पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि 1.5 डिग्री की सीमा से ऊपर होने वाली किसी भी वृद्धि को न्यूनतम और कम अवधि तक सीमित रखना भी जरूरी है, ताकि पृथ्वी के बर्फीले क्षेत्रों और उन पर निर्भर वैश्विक पारिस्थितिक तंत्रों को बचाया जा सके।

Also Read: दुनिया में वन्यजीवों की आबादी में 53 वर्षों में 73% की गिरावट

You Might Also Like

पश्चिमी घाट के पवित्र वनखंड भविष्य के लचीले जंगलों के लिए बन रहे प्राकृतिक नर्सरी
पश्चिमी घाट में लाइकेन की पांच नई प्रजातियों की खोज, भारत की जैव विविधता को मिली नई पहचान
2025 में दुनिया ने 70 लाख हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र खोया, 2030 के लक्ष्य से काफी पीछे
स्वस्थ प्रवाल के संपर्क से सात सप्ताह में ठीक हुए ब्लीचिंग प्रभावित कोरल, वैज्ञानिकों की नई खोज
मानसून ने बदली कश्मीर की तस्वीर
TAGGED:1.5 degree Celsius limitCOP31CryosphereGlobal warmingICCI Report 2026Mountain GlaciersPolar Ice Sheetssea-level riseUNEP
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp LinkedIn Email Copy Link Print
1 Comment
  • Pingback: डेविड एटनबरो के समर्थन से 30 मिलियन पाउंड में खरीदी गई 9,500 एकड़ जमीन, वन्यजीव संरक्षण के लिए होगा इस्

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe
LinkedInFollow
Popular News
AI Image
News

भारत में सांप के काटने का संकट: हर साल हजारों जिंदगियां निगल रही एक अनदेखी त्रासदी

Environment Pulse
Environment Pulse
September 3, 2026
सूखे की मार: श्रीलंका के याला नेशनल पार्क के प्रमुख हिस्सों में पर्यटकों की एंट्री पर रोक
भूजल का दुरुपयोग पड़ा महंगा, तीन स्टेडियमों पर लगी रोक
कश्मीर इकोटूरिज्म एसोसिएशन और टूरिज्म इंडिया एलायंस के बीच ऐतिहासिक समझौता, सतत पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
लचीलेपन की कमी वाले थर्मल पावर अनुबंध भारत के ऊर्जा संक्रमण के लिए खतरा: CSE अध्ययन

Categories

  • जल
  • जमीन
  • जंगल
  • जैव-विविधता
  • हवा
  • खनिज
  • ऊर्जा
  • ग्रीन जॉब
  • स्टोरी
  • इम्पैक्ट फीचर
  • वीडियो

About US

Environmentpulse.com is a bilingual (Hindi-English) news platform that presents high-quality news, views, and videos related to the environment.
Quick Link
  • ऊर्जा
  • खनिज
  • जैव-विविधता
  • जंगल
Top Categories
  • My Bookmark
  • Contact
  • Privacy Policy
Environment PulseEnvironment Pulse
© Pratham Publisher and Informatics Private Limited. All Rights Reserved. | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?