भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल बंटवारा संधि की अवधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है, जिसे लेकर संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) के माध्यम से तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी है। बांग्लादेश ने शुष्क मौसम में पानी की स्पष्ट गारंटी वाली नई या संशोधित संधि की मांग की है, जबकि भारत के भीतर बिहार ने जल उपलब्धता, फरक्का बैराज पर गाद जमाव और बाढ़ से जुड़ी चिंताएं उठाई हैं। इसी बीच, बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) के वैज्ञानिकों ने लखनऊ के पास करेला झील के अवसादों का अध्ययन कर मध्य गंगा के मैदान के 4,600 वर्षों के जलवायु और पर्यावरणीय इतिहास का पता लगाया है, जो भविष्य में जल प्रबंधन, आपदा जोखिम कम करने और क्षेत्रीय जल सुरक्षा की रणनीतियां तैयार करने में मददगार साबित होगा।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारा संधि की अवधि 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। इसे देखते हुए दोनों देशों के बीच संयुक्त नदी आयोग (जेआरसी) के माध्यम से तकनीकी स्तर पर बातचीत जारी है। इसी बीच, एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में मध्य गंगा के मैदान के 4,600 वर्षों के जलवायु और पर्यावरणीय इतिहास का पुनर्निर्माण किया गया है।
यह शोध मानसून में दीर्घकालिक बदलावों को समझने और भविष्य में जल प्रबंधन की रणनीतियां तैयार करने में मददगार साबित हो सकता है। वर्ष 1996 में हुई गंगा जल बंटवारा संधि के तहत जनवरी से मई के शुष्क मौसम में फरक्का बैराज पर उपलब्ध गंगा जल के बंटवारे की व्यवस्था निर्धारित की गई थी।
इसके अनुसार, जल प्रवाह 70,000 क्यूसेक या उससे कम होने पर भारत और बांग्लादेश को बराबर हिस्सा मिलता है। 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच प्रवाह होने पर बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक पानी देने का प्रावधान है। वहीं, प्रवाह 75,000 क्यूसेक या उससे अधिक होने पर भारत को 40,000 क्यूसेक पानी मिलता है और शेष जल बांग्लादेश को दिया जाता है। बांग्लादेश ने नई या संशोधित संधि की मांग की है, जिसमें शुष्क मौसम के दौरान उसके हिस्से के पानी की स्पष्ट गारंटी हो। यह व्यवस्था वर्ष 1977 के पूर्ववर्ती समझौते की तर्ज पर रखने की मांग की जा रही है।
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने समय सीमा से पहले नए समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा है कि इस दिशा में संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से काम जारी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि नदी जल से जुड़े मामलों पर दोनों देशों के बीच संयुक्त नदी आयोग के ढांचे के तहत चर्चा की जा रही है और तकनीकी स्तर की बैठकें जारी हैं।
बिहार ने उठाए जल उपलब्धता और बाढ़ के मुद्दे गंगा जल बंटवारे को लेकर भारत के भीतर भी चिंताएं सामने आई हैं। बिहार ने संधि के राज्य में जल उपलब्धता पर पड़ने वाले प्रभाव, फरक्का बैराज से जुड़ी गाद जमाव की समस्या और बाढ़ संबंधी चुनौतियों पर चिंता जताई है।
राज्य के नेताओं द्वारा इस महीने के अंत में प्रस्तावित गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग की बैठक में इन मुद्दों को उठाए जाने की उम्मीद है। बिहार चाहता है कि भविष्य की किसी भी व्यवस्था में राज्य की दीर्घकालिक जल जरूरतों और बाढ़ प्रबंधन संबंधी चिंताओं को पर्याप्त महत्व दिया जाए। लखनऊ के पास झील से 4,600 वर्षों के जलवायु इतिहास का अध्ययन इस बीच, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने मध्य गंगा के मैदान में पिछले 4,600 वर्षों के जलवायु और पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन किया है।
शोधकर्ताओं ने लखनऊ जिले में हुलास खेड़ा के पास स्थित करेेला झील से प्राप्त अवसादों का विश्लेषण किया। यह एक पुरानी नदी धारा से बनी ऑक्सबो झील है। अध्ययन में स्थिर समस्थानिकों, परागकण विश्लेषण, अवसादों के कण आकार, तलछट मॉडलिंग और रेडियोकार्बन डेटिंग सहित कई वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया गया।
शोध के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया कि भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून में उतार-चढ़ाव का झील के जलस्तर, जल प्रवाह, अवसादों के परिवहन, वनस्पति में बदलाव और प्राचीन कृषि पद्धतियों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ा। अध्ययन में 4,200 वर्ष पूर्व की शुष्क जलवायु घटना, रोमन गर्म काल और लघु हिमयुग जैसे प्रमुख जलवायु चरणों से जुड़े पर्यावरणीय बदलावों की पहचान की गई।
निष्कर्ष बताते हैं कि मानसून में परिवर्तन का प्रभाव जल निकासी, जैविक पदार्थों के जमाव और क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन कृषक समुदायों की अनुकूलन रणनीतियों पर पड़ा। यह शोध जर्नल ऑफ एशियन अर्थ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है। इससे दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन, जल सुरक्षा, आर्द्रभूमि संरक्षण और गंगा बेसिन में आपदा जोखिम कम करने की रणनीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
जल सुरक्षा के लिए अतीत से सबक गंगा दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों में से एक है। इस पर करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि, पेयजल और पारिस्थितिकी निर्भर करती है। ऐसे में भारत-बांग्लादेश के बीच जल बंटवारे पर जारी बातचीत और गंगा के मैदान में जलवायु परिवर्तन से जुड़े नए वैज्ञानिक निष्कर्ष भविष्य की जल नीतियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
एक ओर दोनों देशों के सामने संधि की अवधि समाप्त होने से पहले जल बंटवारे पर सहमति बनाने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर मानसून की दीर्घकालिक अनिश्चितता जल प्रबंधन को और जटिल बनाती है। वैज्ञानिक शोध से मिले निष्कर्षों को नीति निर्माण में शामिल करना क्षेत्रीय सहयोग, कृषि अनुकूलन और जल सुरक्षा के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
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